Tuesday, July 14, 2020

45 वर्ष चले जीवट-भरे विज्ञान-कर्म का रोचक इतिहास

विनोद वार्ष्णेय 

अरुण कुमार असफल की नई पुस्तक 'महा-अभियान की महागाथा--78 डिग्री" में उस समय की दास्तान है जब वैज्ञानिकों में यह जानने की प्रबल जिज्ञासा  थी कि आखिर हमारी पृथ्वी का आकार कैसा है, इसकी वास्तविक माप कितनी है। आसमान में तारों की स्थिति के अवलोकन के आधार पर  कुछ सिद्धांत विकसित हुए थे जिनसे कुछ गणनाएं और दावे पेश किए जा रहे थे। लेकिन इनकी पुष्टि के कोई साधन न थे। 

आज स्थिति अलग है: आकाश से अवलोकन करने वाले और चप्पे-चप्पे की फोटो लेकर पृथ्वी पर भेजने 
में सक्षम उपग्रह हैं । हाल में भारत ने अंतरिक्ष में कार्टोसैट-3 उपग्रह प्रक्षेपित  किया जो 605 किलोमीटर की ऊँचाई से पृथ्वी के दृष्टि वर्णक्रम के सभी रंगों की स्पष्ट तस्वीरें भेज रहा है। इन डिजिटल चित्रों से पृथ्वी के किसी भी इलाके की लम्बाई, चौड़ाई और ऊंचाई या गहराई नापने के साथ साथ यह भी पता लग जाता है कि कहां रेगिस्तान है और कहाँ जलप्लावन या दलदल, सूखी मिट्टी, चट्टान, ढलान, चढ़ाई, जंगल, सड़क, भवन आदि। इसमें एक ऐसा  कैमरा भी है जो बता सकता है कि पृथ्वी की सतह पर कहाँ कितना तापमान है। 

लेकिन इस पुस्तक में वर्णित ज़माना वह है, जब पृथ्वी की सतह पर दो बिंदुओं के बीच की दूरी जंजीर से नापी जाती थी। मापन सम्बन्धी यांत्रिकी, खुर्दबीन, दूरबीन आदि के विकास के वे शुरूआती दिन थे। ये चीजें उस समय के हिसाब से महान उपलब्धियां थीं और कुछ ही देश उन्हें बना पाते थे। इन उपकरणों के जरिए पूरी पृथ्वी को सही-सही नापना और उसका सटीक मानचित्र बनाने का उपक्रम सचमुच में मानवीय हौसले, परिश्रम, धैर्य और कुशलता की दरकार रखता था। 

भू-सर्वेक्षण की प्रक्रिया में पूरी पृथ्वी को काल्पनिक देशांतर और अक्षांश रेखाओं में विभाजित कर लिया जाता है। उत्तरी ध्रुव से दक्षिणी ध्रुव को मिलाने वाली 360 देशांतर रेखाएं  हैं जिनका नामकरण शून्य से लेकर 360 डिग्री तक किया गया है। लेखक  ने जिस महागाथा के बारे में लिखा है, वह विशेषकर 2,500 किलोमीटर लम्बी  '78 डिग्री देशांतर रेखा' के मापन से जुड़ी है जो विश्व का इस तरह का सबसे बड़ा वैज्ञानिक अभियान था। ये काल्पनिक रेखाएं गोल पृथ्वी पर हैं इसलिए गोलाकार होती हैं इसलिए इसका उल्लेख महत्तम चाप (या महाचाप) के रूप में भी किया जाता है। लेखक बताता है कि भारत में चले इस अभियान में जितनी जानें गईं, उतनी ही भारत में उस दौरान विभिन्न युद्धों में गई होंगी। 

इन युद्धों, योद्धाओं के पराक्रम और रणकौशल, राजाओं-नबावों की हार-जीतों और नए साम्राज्य की 
स्थापनाओं के इतिहास पर सैंकड़ों पुस्तकें हैं लेकिन मानवीय वैज्ञानिक जिज्ञासा के वशीभूत चले उक्त 
महा-अभियान पर ढूढ़ने पर भी पर हिंदी में कुछ ख़ास नहीं मिलता। संभवतः इस विषय पर हिंदी में  
यह अपने किस्म की पहली पुस्तक है।  

पुस्तक के लेखक 'भारतीय सर्वेक्षण विभाग' में कार्यरत हैं और इस नाते सर्वेक्षण और मानचित्रण के विज्ञान, उससे जुड़ी तकनीकी प्रक्रियाओं और उसके इतिहास से बखूबी वाकिफ हैं जिससे पुस्तक विभिन्न तकनीकी विवरण के मामले में विश्वसनीय है। वे साहित्य प्रेमी भी हैं और कथा साहित्य लिखते रहे हैं। शायद यही वजह है कि पुस्तक में कथा तत्व प्रचुरता से है। लेकिन पुस्तक पृथ्वी की सतह की तरह है, कहीं सरल, सपाट, मनोरम तो कहीं बीहड़। बीहड़ स्थलों पर पाठक को कथ्य समझने के लिए दिमाग पर जोर लगाना पड़ेगा और रसास्वादन में कुछ मुश्किल होगी। 

पर विज्ञान की किताब का रसास्वादन पाठक के विषय सम्बन्धी ज्ञान से भी जुड़ा होता है। जो पाठक भूगोल या भू-सर्वेक्षण के कार्य या सिद्धांत से अपरिचित हैं, उनके लिए महत्तम चाप, अठहत्तर डिग्री देशांतर रेखा, अठारह डिग्री अक्षांश, त्रिकोणीय श्रंखला, त्रिकोण की आधार रेखा और समूचे भू-क्षेत्र को त्रिकोणों में बांटने की अवधारणा आदि चीजें अबूझ बनी रहेंगी हालांकि लेखक ने  दावा किया है कि 'तकनीकी पदों और क्रियाओं का सरलीकरण किया गया है जिससे साहित्य के पाठकों को यह कहानी सहज लगे'। 

पुस्तक में जहाँ-जहाँ तकनीकी या सैद्धांतिक विवरण आते हैं, वहां-वहां लगता है कि सरपट दौड़ती गाड़ी कहीं ऊबड़खाबड़ इलाके में घुस आई है। अन्यथा तो पुस्तक अक्सर रोचक उपन्यास जैसा आनंद देती है जिसमें हीरो हैं विश्व-प्रसिद्ध विलियम लैम्बटन और जॉर्ज एवरेस्ट जो अद्भुत जीवट, लगन, कभी हार न मानने वाली जिद के धनी हैं। उनका किरदार बहुत अच्छे ढंग से पेश किया गया है। उन दिनों चिकित्सा सुविधाओं के अभाव में बीमारियों, महामारियों से लड़ते हुए, बाघ, शेर, चीते आदि वन्य पशुओं के खतरों के बीच असह्य मौसम में जंगल, दलदल, रेगिस्तान,पहाड़, वेगवती नदी व अनेक तरह के दुर्गम इलाकों के बीच से गुजर उचित स्थल तक तक पहुंच और वहां भू-सर्वेक्षण के लिए शिविर की स्थापना कर महीनों डटे रहने के वृतांत आज के आरामतलब जीवन जीने वालों के तो रोंगटे खड़े कर देगा। 

पुस्तक में भू-सर्वेक्षण की जरूरत, लम्बे समय तक चलने वाले इस अभियान की जटिलताओं, इससे जुड़ी जिज्ञासाओं के वर्णन के जरिए उन बुनियादी सवालों की भी जानकारी दी गई है जो उन दिनों वैज्ञानिकों को विस्मित करते थे और अपने आसपास की प्राकृतिक भौगोलिक स्थितियों और ब्रह्मांडीय पिंडों की असलियत को समझना चाहते थे। उनमें एक बड़ा सवाल यह था कि पृथ्वी का आकार कैसा है--चपटा, गोल, दीर्घवृत्तीय, चतुर्भुजीय या अर्धगोलाकार। यह जानने के लिए नई-नई युक्तियाँ और उपकरण सोचे जा रहे थे, बनाए जा रहे थे। भौगोलिक दूरियां मापी जा रहीं थीं, उन्हें ज्यामितीय कोण (डिग्री) की समझ से जोड़ा जा रहा था। पुस्तक उस समय के अंकगणित, ज्यामिति, दर्शन और खगोल सम्बन्धी परिकल्पनाओं का ख़ासा ऐतिहासिक बोध करा देती है।     

इसमें ऐसे विवरण भी बहुत हैं जो उस समय के भारतीय समाज और ब्रिटिश औपनिवेशिक प्रशासनिक तरीकों को समझने में मदद करते हैं। प्रस्तुत भू-वैज्ञानिक अभियान उस समय का है, जब ईस्ट इंडिया कंपनी कोई व्यापारिक प्रतिष्ठान मात्र नहीं रह गई थी। अँगरेज़ भारत की आंतरिक कूटनीति में दखल देने लगे थे और पूरे भारत में अपना साम्राज्य फ़ैलाने के लिए सैनिक व्यूहरचना और अपेक्षाकृत सुगम मार्गों के लिए भू-सर्वेक्षण को बहुत ही उपयोगी चीज मानते थे। लेखक ने बताया है कि जो सैन्य कर्मचारी गणित और खगोलशास्त्र का थोड़ा बहुत भी ज्ञान रखते थे, वे रास्ते भर नाप-पैमाइश और खगोलीय प्रेक्षण की मदद से रास्ते का कच्चा खाका तैयार करते जाते थे। दिशा के सही ज्ञान के लिए खगोलीय प्रेक्षण जरूरी होता था और उसके लिए वेधशालाएं जरूरी थीं। पर उस समय सारी वेधशालाएं स्थानीय शासकों के कब्जे में थीं इसलिए अंग्रेज  जगह-जगह अपनी निजी वेधशालाएं बनवा रहे थे। हिन्दुओं को गणित और खगोलशास्त्र में महारत हासिल थी, इसलिए उनकी पांडुलिपियां भी खोजी जा रही थीं। 

पुस्तक का पहला हीरो विलियम लैम्बटन ब्रिटिश सेना में था और भारत आने से पहले अमेरिका में युद्ध में भाग ले चुका था। 1796 में वह आर्थर वेलेजली की 33वीं बटालियन में  लेफ्टिनेंट बनकर भारत आया। पर उसकी मूल दिलचस्पी भू-विज्ञान में थी। उसने प्रसिद्ध गणितज्ञ से गणित और खगोलशास्त्र की शिक्षा ली थी। भारत में उसने अपना वैज्ञानिक कार्य चलाया और प्रतिष्ठित वैज्ञानिक पत्रिका 'एशियाटिक रिसर्च' में शोध लेख भी प्रकाशित करवाए। 

4 अप्रैल 1799 को जब टीपू सुल्तान की फ़ौज पर धावा बोलने के लिए ब्रिटिश सेना भेजी गई तो वह असैनिक अधिकारी के रूप में साथ गया। उस दौरान उसने कमांडर की भयंकर गलती पकड़ी। उसने आकाश में सप्तर्षि मंडल की स्थिति देखकर पता लगाया था कि कमांडर सैनिक टुकड़ी को गलत दिशा में भेज रहा है। पहले उसकी सलाह की अवहेलना की गई पर कुछ ही दिनों में सबको गलती साफ़ नज़र आने लगी तो फिर टुकड़ी को उसके बताए मार्ग पर भेजा गया। इससे उसके खगोलीय ज्ञान का डंका बज गया और सेनापति आर्थर वेलेज़ली उसकी प्रतिभा और दक्षता का मुरीद हो गया। उसके समक्ष प्रस्ताव रखा गया कि वह समूचे मैसूर, हैदराबाद, मराठा सहित पूरे प्रायद्वीप का ऐसा मानचित्र बनाए जो सटीक हो, वैज्ञानिक सिद्धांतों पर आधारित हो। उन दिनों पृथ्वी के आकार जानने सम्बन्धी जो कार्य यूरोप में चल रहे थे, उनसे वह पूरी तरह अवगत था। उक्त ब्रिटिश प्रस्ताव में उसे अपने लिए अवसर नज़र आया कि वह इसके जरिए भूविज्ञान के क्षेत्र में कुछ नया कर पाएगा। उन दिनों वैज्ञानिक इस रहस्यपूर्ण उलझन से जूझ रहे थे कि कुछ जगहों पर पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण मान असामान्य रूप से अलग क्यों निकल कर आ रहे हैं। लैम्बटन को लगा कि इस बात की पुष्टि के लिए वह बिलकुल सही जगह पर है और अगर उस क्षेत्र की सही-सही माप की जाए तो गुरुत्वाकर्षण के विविध प्रयोगों से जो निष्कर्ष सामने आ रहे थे, वह उनकी पुष्टि कर पाएगा। तो, उसने प्रस्ताव तैयार किया कि कन्याकुमारी और हिमालय की गोद में बसे मसूरी से गुजरने वाली 1,600 मील (2,500 किलोमीटर) लम्बी 78 डिग्री देशांतर रेखा को नापा जाए। 

सरकार का सोचना था कि इसकी मदद से जो मानचित्र बनेंगे, वे अंग्रेजों को भारत पर राजनैतिक प्रभुत्व जमाने के साथ-साथ यहां की प्रचुर भौतिक सम्पदा के दोहन का काम आसान करेंगे। उसकी प्रोजेक्ट फटाफट मंजूर हो गई। उसके बाद पुस्तक में इंग्लैंड से मापनयंत्रों को हासिल करने के प्रयासों की कहानी चलती है जिसमें बताया जाता है कि उसका प्रिय आधा टन भारी और आदमकद से भी बड़ा यंत्र 'थियोडोलाइट' अंततः सितम्बर 1802 में कैसे जैसे-तैसे मद्रास पहुँचा।     

ब्रिटिश उपनिवेशवादियों के लिए भू-सर्वेक्षण की उपयोगिता प्रमुखतः भूमि पर अपनी प्रभुसत्ता स्थापित करने, प्राकृतिक संसाधनों के दोहन तथा परिवहन के लिए आधार संरचना बिछाने की जरूरत से जुड़ी थी। इसके लिए दूरियों, दिशाओं, सीमाओं, क्षेत्रफलों का जानना आवश्यक था। पहले यह सब जानकारियां स्थानीय लोगों के स्मृति पटल पर अंकित रहती थीं पर जब यह सब मानचित्र के रूप में कागज़ पर अंकित होने लगी तो जानकारियां समेटने और उसके विश्लेषण की क्षमता और विश्वसनीयता बहुत बढ़ गई। 

इतिहास है कि पृथ्वी पर विभिन्न भू-भागों के आकार यानी लम्बाई-चौड़ाई-ऊंचाई-वक्रता आदि सम्बन्धी गणित की शाखा 'भू-गणित' का आधुनिक युग 1700 में शुरू हुआ। औद्योगिक क्रांति के फलस्वरूप नए नए किस्म के यन्त्र भी बनने लगे। सर्वेक्षण की त्रिकोणीय विधि विशेष रूप से प्रचलन में आई। पूरे भारत को वैज्ञानिक परिशुद्धता के साथ मापने के लिए लैम्बटन ने इसी विधि के आधार पर 'ग्रेट ट्रिगोनोमेट्रिकल सर्वे' की योजना बनाई जिसके तहत पूरे भारत को त्रिकोणों में बाँटना और उनका मापन किया जाना था।  इसके लिए त्रिभुज की आधार रेखा को बहुत सावधानी से नापना होता, बाकी दो भुजाओं की माप तो कोणीय माप से भी निकाली जा सकती थी। इसके अलावा रैखिक दूरी और कोणीय दूरी, दोनों तरह के माप लेने होते थे। कई बार सही जगह की पहचान करना बहुत मुसीबतज़दा होता। और सबसे बड़ी बात, लैम्बटन का जोर मापन की शुद्धता पर बहुत होता जिसके लिए उसने अनेक विधियां ईजाद कीं। फिर भी कई बार तो वह महीनों से चली आ रही पूरी-की-पूरी कष्टकारी माप-श्रृंखला फिर से दोहराता।     

लैम्बटन के सर्वेक्षण की उत्कृष्टता की वैज्ञानिक समुदाय में प्रशंसा हो रही थी। 1817 में उसे रॉयल सोसाइटी का सदस्य बन गया। उधर, ईस्ट इंडिया कंपनी के कुछ अधिकारी गवर्नर जनरल के कान भरा करते कि '78 डिग्री देशांतर' के चक्कर में निज़ाम के क्षेत्र का नक्शा तैयार करने में बहुत विलम्ब हो रहा है। टीपू सुल्तान के मारे जाने के बाद सम्पूर्ण निज़ाम और मैसूर क्षेत्र जिस तरह अंग्रेजों को मिल गया, उसी तरह 6 अप्रैल 1819 को सम्पूर्ण मराठा क्षेत्र पर भी अंग्रेजों का आधिपत्य हो गया और लंदन सरकार के लिए सभी जगह के सटीक मानचित्रों की जरूरत और बढ़ गई ताकि हुक्मरानों को यहाँ के चप्पे-चप्पे की जानकारी हो सके।    

पर यह काम चटपट कैसे हो सकता था? किसी तय किए गए क्षेत्र में त्रिकोण की  एक भुजा, आधार-रेखा को मापना ही बहुत लम्बा कार्य होता था। अकेले इसमें ही डेढ़ दो माह का समय लग जाता। इसके बाद रेखा के दोनों सिरों पर खगोलीय प्रेक्षण करना होता जिससे रेखा की सही-सही दिशा निर्धारित की जा सके।  यह काम कई रातों में संपन्न हो पाता। खगोलीय प्रेक्षण जटिल कार्य होता था जिसे गणित और खगोलशास्त्र जानने वाला व्यक्ति ही सही-सही कर सकता था। इसमें गलती का अर्थ होता दिशा में भटकाव। इसलिए यह काम लैम्बटन  खुद करता। इसके लिए उसे कई-कई रातें जागकर बितानी पड़तीं। भारत के कठोर मौसम में निरंतर बिना उचित विश्राम लिए मेहनत का नतीजा यह हुआ कि लैम्बटन को तपेदिक हो गई। पर काम का जुनून इतना कि वह फिर भी अनवरत काम करता रहा। सरकार की इतनी दयादृष्टि जरूर रही कि उसकी शोधपरक रुचि देखते हुए उसे कई अन्य चीजों से मुक्त कर केवल 'ग्रेट ट्रिग्नोमेट्रिकल सर्वे' का चीफ बना दिया गया था।

उसे इंग्लैंड जाकर चिकित्सा की सलाह दी गई। वह दो दशक से स्वदेश से बाहर रह चुका था। इंग्लैंड में वैज्ञानिकों से मिलना भी चाहता था। पर भारत का काम वह ऐसे ही छोड़कर नहीं जा सकता था। वह जाने से पहले एक ऐसा सुयोग्य सहायक चाहता था जो उसके पीछे उसके गुणवत्ता के मानदंडों के अनुरूप काम कर सके। 25 अक्टूबर, 1817 को जॉर्ज एवरेस्ट के रूप में उसे सत्रह वर्षीय गणित और खगोलशात्र समझने वाला सहायक मिला। 

एवरेस्ट गुणवत्ता के मामले में लैम्बटन की प्रतिलिपि निकला। यही वजह है कि वह '78 डिग्री की महागाथा' का दूसरा नायक है। उसका जन्म ग्रीनिच में हुआ था जहां पर विश्व की सबसे आधुनिक वेधशाला थी और जहां का बच्चा-बच्चा अक्षांश और देशांतर रेखा के मायने समझता था।   

लैम्बटन कुछ स्वस्थ होकर इंग्लैंड से लौटा। पर उन दिनों तपेदिक का कोई पक्का इलाज न था। तपेदिक होते हुए भी वह काम के सिलसिले में लम्बी-लम्बी यात्राएं करता रहा। अंततः 20 जनवरी, 1823 की रात वर्धा और नागपुर के बीच हिंगनघाट गांव में लगे शिविर के अपने तम्बू में उसने प्राण त्याग दिए। सबने माना कि वह भारत के इस भू-भाग में पृथ्वी का आकार नापने के काम में जी-जान से लगा रहा। उसने कभी नगरीय सुख सुविधाएं नहीं भोगीं, जंगल-जंगल पर्वत-पर्वत घूमना ही जैसे उसकी मनमांगी किस्मत थी। खास बात यह कि इस काम के लिए उसे न तो ईस्ट इंडिया कंपनी ने आदेश दिया था और न ही इंग्लैंड सरकार ने। इसकी योजना उसने खुद बनाई थी और सरकार से मंजूर कराई थी। 

लैम्बटन की मृत्यु के बाद 'ग्रेट ट्रिग्नोमेट्रिकल सर्वे' विभाग का योग्यता की दृष्टि से असली उत्तराधिकारी जॉर्ज एवरेस्ट ही हो सकता था और वही उसका मुखिया बनाया गया। उसके काम का लेखक ने विवरण इस तरह दिया है: एवरेस्ट के साथ स्थानीय ग्रामीण लोग भी होते थे। वे इस बात से चकित थे कि आसपास के शेर-भालू-चीते कभी उसके शिविर के पास नहीं फटकते। अन्धविश्वास का आलम यह कि वे मानने लगे कि एवरेस्ट के पास जरूर कोई दैवी शक्ति है। ये लोग अनपढ़ थे, उनमें किसी वैज्ञानिक सोच का होना तो बहुत दूर की बात थी। एवरेस्ट जब दूरबीन लगाकर दूर पहाड़ पर मशाल को ढूंढ़ता या खगोलीय प्रेक्षण के दौरान आकाश में तारों को ढूंढ़ता तो आसपास के मजदूर सोचते कि वह स्वर्ग में बैठे देवी-देवताओं से संपर्क साधने की कोशिश कर रहा है। घनी दाढ़ी-मूंछों की वजह से वह वैसे ही संन्यासी जैसा लगता था। खबर आसपास के गावों तक में फ़ैल जाती कि कोई साधू जंगल में साधना के लिए आया हुआ है और आसपास के दीन-दुखियारी और बीमार वहां आकर भीड़ लगा लेते और उसकी थिओडोलाइट मशीन के आगे नतमस्तक हो जाते और एवरेस्ट से कृपा की आशा में उसके समक्ष लंबलोट हो जाते।   

जॉर्ज एवरेस्ट ने कई नव प्रवर्तन किए। उनमें एक था दिन में रंगीन झंडों की जगह रात में मशाल आदि से प्रेक्षण करना  जिससे काम की गति बढ़ गई। रात में वह प्रकाश अपवर्तन का भी लाभ लेता जिससे यदि दिन में किसी पहाड़ पर लगा झंडा या संकेत किसी बाधा की वजह से दिखाई न देता, तो प्रकाश अपवर्तन की वजह से बाधा के बावजूद वह नीली रोशनी दिखाई पड़ जाती थी। प्रशिक्षित सिग्नलमैन नीली बत्ती लिए पहाड़ पर बैठे रहते और एवरेस्ट थिओडोलाइट की दूरबीन से पाठ्यांक लेता। नीली बत्तियों का इस्तेमाल उसके दिमाग की उपज थी।  

एवरेस्ट के समय में शिविर में 400-500 लोग होते और हैजा मलेरिया जैसी बीमारी भी फैलती रहतीं। यह 
काम ऐसा था कि स्वास्थ्य पर ध्यान देना संभव नहीं था। बुखार के दौर आते रहते और तब उसे लगता 
कि चिकित्सकों की राय मान कर उसे कुछ समय के लिए काम से हट जाना चाहिए। पर उसने ऐसा नहीं किया। उसका स्वास्थ्य बिगड़ता गया। अंततः चिकित्सा के लिए उसे भी वापस लन्दन जाना पड़ा। 


इंग्लैंड में उस समय औद्योगिक विकास का उत्कर्ष काल चल रहा था। खगोलीय प्रेक्षण और सर्वेक्षण के लिए नए-नए यंत्र बन रहे थे और पूरे यूरोप में इस्तेमाल हो रहे थे। नए सिद्धांत भी आ रहे थे। मसलन पृथ्वी पर पहाड़ जैसी सघन द्रव्यमान वाली भौगोलिक संरचनाएं तो दिखाई देती हैं लेकिन पृथ्वी के नीचे भी इस किस्म की सघन द्रव्यमान वाली सरंचनाएं हो सकती हैं, जो दिखाई नहीं देतीं। इससे भी गुरुत्वीय बल कहीं अधिक, कहीं कम होने की सम्भावना रहती है। भारत में इस बल को मापने का उस समय न कोई यन्त्र था और न  सर्वेक्षण में इस बल के इस्तेमाल की कोई कोशिश हुई थी। लंदन जाकर जॉर्ज एवरेस्ट त्रिकोणीय प्रेक्षण के साथ-साथ गुरुत्वीय प्रेक्षण का हिमायती हो गया।  

एवरेस्ट लगभग पांच साल बाद 6 अक्टूबर, 1930 को भारत लौटा। अब वह न केवल
‘ग्रेट ट्रिग्नोमेट्रिकल सर्वे’का मुखिया था बल्कि उसे ‘भारतीय सर्वेक्षण विभाग’का महासर्वेक्षक भी बना दिया गया था। लैम्बटन की तरह एवरेस्ट का जोर भी गुणवत्ता पर होता। 'एक बार किसी गणना में गलती पकड़ में आ जाती तो वह परेशान हो जाता।' उधर, सरकार का कहना था कि मानचित्र जल्दी बनाए जाएं बेशक उनकी गुणवत्ता कुछ कम हो। सरकार को पूरे अवध और बंगाल क्षेत्र के मानचित्र पाने की जल्दी 
थी। सरकार का यह रुख देख उसने वह काम अन्य के ऊपर छोड़ दिया और खुद पूरी तरह 78 डिग्री देशांतर रेखा (महत्तम चाप) पर लग गया। उसे काम में तेजी लाने के लिए अच्छे संगणक की जरूरत थी। 
इस जरूरत को एक भारतीय हीरो ने पूरा किया जिसका नाम था राधानाथ सिकदर। अठारह साल की 
उम्र में वह दिसंबर 1831 में 'ग्रेट ट्रिग्नोमेट्रिकल सर्वे' विभाग में संगणक पद पर नियुक्त हुआ। वेतन था 30 
रुपए मासिक। मेधावी और बहुत परिश्रमी होने के साथ-साथ उसमें गणितीय क्षमता अद्भुत थी, अंग्रेजी भी अच्छी थी। एवरेस्ट उससे बहुत प्रभावित था और जल्दी ही उसे उप-सहायक बना कर उसका वेतन 107 रुपए पर पहुंचा दिया। इस पद पर तब  तक यूरोपीय ही नियुक्त होते थे।    

पुस्तक उस समय की परिस्थितियों का जीवंत चित्र सामने रख देती है। उसका एक रोचक नमूना यह है: नवनियुक्त बंगाली युवक सीधे स्कूल से आते थे। उन्हें सरकारी कल्चर की कोई समझ न थी। एवरेस्ट उनकी वेशभूषा देखकर क्रोधित होता। काफी गुस्सैल होते हुए भी वह स्थानीय लोगों पर कभी गुस्सा नहीं उतारता था। यह उसकी नीति थी। यहाँ भी उसने युवकों के समक्ष कोई नाराजगी जाहिर नहीं की। 
बस यह निर्देश भिजवा दिया कि वे पेंट न पहन सकें तो धोती की जगह पजामा तो पहनें और बूट नहीं तो 
चप्पल की जगह साधारण काले जूते ही पहनकर ऑफिस आया करें।  

त्रिकोणात्मक सर्वेक्षण में त्रिकोण के लिए उपयुक्त स्थल तलाशने के लिए बहुत मेहनत की जाती और उतनी ही मेहनत आधार रेखा तलाशने के लिए की जाती। पहले कच्चा प्रेक्षण किया जाता फिर बड़ी दूरबीन वाली थियोडोलाइट से वास्तविक प्रेक्षण किया जाता। त्रिकोण के लिए पहाड़ी आदि ऊंचे स्थल आदर्श होते हैं  क्योंकि वहां झंडा या रोशनी देखने में मार्ग में कोई अवरोध नहीं होता था। जहाँ पहाड़ नहीं होते, वहां ऊंचे भवन, मंदिर या मस्जिद तलाशी जातीं। जहां ये सब न होते तो कहीं मचान बनानी पड़ती थीं तो कहीं मीनारें। वहां फिर भारी भरकम यंत्रों को पहुँचाना होता था जो आसान न होता।   

सही जगह तलाशने के लिए एवरेस्ट खुद भी प्रतिदिन 20 से 30 मील पैदल चलता, सूर्योदय से सूर्यास्त तक इलाकों की खाक छानता। काम जो जज्बा लैम्बटन में था, वही जज्बा एवरेस्ट में था। गुणवत्ता का स्तर ऐसा कि एक बार जब सात-आठ मील की आधार रेखा की दंड से नापी दूरी को जब 86 त्रिकोणों की माप के आधार पर की गई गणना से प्राप्त दूरी को मिलाया गया तो महज साढ़े छह इंच का अंतर निकला। यह इस्तेमाल की जा रही प्रणाली की विश्वसनीयता का सबूत था। 

78 डिग्री देशांतर को, जिसे महत्तम चाप भी कहा जाता है, मापने की शुरूआत लैम्बटन ने कन्याकुमारी से की थी और यह काम मैदान, पठार, जंगलों, पर्वतों, जल प्लावित क्षेत्रों, दलदलों, घनी बस्तियों आदि तरह-तरह के क्षेत्रों से होकर गुजरते हुए 1834 तक काफी पूरा हो चुका था। अब उसकी समापन आधार रेखा तय करने की बारी थी जिसके लिए एवरेस्ट ने देहरादून को चुना और मसूरी में डेरा डाल दिया।

पर देहरादून में एवरेस्ट को गठिया का ऐसा दौरा पड़ा कि बाईं जांघ ने बिल्कुल काम करना बंद कर दिया और कूल्हें में असहनीय दर्द होने लगा। डाक्टर ने उसे त्रिकोणीय सर्वेक्षण कार्य से एकदम अलग हो जाने की सलाह दी, पर वह तो लैम्बटन जैसा ही हठी था। नतीजा यह कि तबियत इतनी ख़राब हो गई कि मई 1835 से अक्टूबर 1835 तक उसे बिस्तर पर ही पड़ा रहना पड़ा। उस समय गठिया के इलाज भी अजीब थे। एक हजार से ज्यादा बार जोंकों से खून चुसवा कर उसके रक्त की सफाई की गई। उसकी बीमारी की ख़बरों के बीच सरकार ने एक अन्य सर्वेक्षक, जरविस को कार्यकारी महासर्वेक्षक नियुक्त कर दिया था जिसे एवरेस्ट अधकचरे ज्ञान वाला मानता था। ऐसे व्यक्ति के लिए जो गुणवत्ता बनाए रखने के लिए दिनरात एक किए रखता था, यह स्थिति बहुत अपमानजनक थी। बहरहाल एवरेस्ट ने उसे डिग्री 78 देशांतर के काम से दूर रखा।  

महा-अभियान का समापन दो स्थानों पर एकसाथ खगोलीय प्रेक्षण के साथ ख़त्म करने की योजना 
बनी। इसके लिए मुज़फ्फरनगर के कचौली गांव स्थित कलियाना की अस्थायी खगोलीय वेधशाला में 
और साथ ही विदिशा जिले के कल्याणपुर में तारों को देखकर पाठ्यांक नोट करना तय हुआ। इसके लिए दो दल बनाए गए। इसके बाद यही काम फिर विदिशा से बीदर के बीच दोहराया गया। अंततः 11 जनवरी, 1841 को खगोलीय प्रेक्षण कार्य पूरा हुआ और सारी अस्थायी खगोलीय वेधशालाएं स्थानीय राजनीतिक प्रतिनिधियों के सुपुर्द कर दी गईं। लेकिन एवेरेस्ट का चार्ट बनाने, रिपोर्ट तैयार करने और गणना करने का कार्य चलता रहा। सर्वेक्षण का काम ख़त्म हो चुका था इसलिए उसने मसूरी स्थित घर छोड़ दिया और 1844 की शुरूआत में वह वापस इंग्लैंड पहुंच गया। पर गणना कार्य तो अभी बहुत लम्बा चलना था।  

काम का जूनून उस पर इस कदर सवार रहा था कि उसे शादी करने की भी फुर्सत नहीं मिली। 17 नवम्बर, 1846  को  आख़िरकार 56 वर्ष की उम्र में उसने एमा से विवाह किया। इसके कुछ ही महीने पश्चात महत्तम चाप से सम्बंधित उसके सम्पूर्ण गणना कार्य और परिणाम प्रकाशित हुए। उसने पृथ्वी के आकार सम्बन्धी स्थिरांक भी दिए जिन्हें एवरेस्ट स्थिरांक कहा  जाता है।  इन्हें भारतीय भूभाग में समस्त भौगोलिक कार्य जैसे मानचित्रण, समुद्र तल से ऊंचाई, दो स्थलों के बीच दूरी ज्ञात करने आदि में इस्तेमाल किया जाता है। उसने पृथ्वी के दो अर्द्ध मुख्य अक्ष की माप क्रमशः 6,477,301 और 6,356,100  मीटर बताई जो आज अंतरिक्ष प्रेक्षण में पाई गई माप से बहुत भिन्न नहीं है। इस तरह 1847 में जाकर यह काम समाप्त हुआ। 

इस पूरे अभियान में 45 साल लगे जिस दौरान 2,500 किलोमीटर लम्बे चाप (78 डिग्री देशांतर रेखा) को असाधारण परिशुद्धता के साथ नापा गया। एवरेस्ट स्थिरांक से विश्व के वैज्ञानिक समुदाय को काफी मदद मिली। इसी मान के आधार पर हिमालय की चोटियों की सही-सही ऊंचाई ज्ञात करना आसान हो गया। और तब 1850 में पता चला कि गणना-पुस्तिका में जिसे 'पीक-15' कहा गया है, वह सबसे ऊंची चोटी है। 1856 में इसका ही नाम माउंट एवरेस्ट रखा गया।  

पूरी पुस्तक दिलचस्प वाकयों से भरी है। इतिहास और रोमांचक किस्से-कहानियों के बीच विज्ञान की बातें पढ़ना मजेदार अनुभव है। ऐसी किताबें निरंतर लिखी जानी चाहिए और पढ़ी जानी चाहिए।   


महा-अभियान की महागाथा--78 डिग्री
लेखक: अरुण कुमार असफल
प्रकाशक: सेतु प्रकाशन, दिल्ली
मूल्य: 250 रुपए 

(इस पुस्तक समीक्षा का संक्षिप्त रूप मशहूर साहित्य पत्रिका 'हंस' के अप्रैल, 2020 अंक में प्रकाशित हो चुका है)



Thursday, July 2, 2020

कोविड-19 के इलाज के लिए असरदार 'एन्टीबॉडी' बनाने में 'गाय' कर सकती है मदद

विनोद वार्ष्णेय
कोरोना वायरस का प्रसार थमने का नाम नहीं ले रहा। दुनिया में इस लेख के लिखे जाने तक एक करोड़ से अधिक लोग संक्रमित पाए जा चुके हैं और इस नए दुश्मन से लड़ते हुए पांच लाख से ऊपर लोग जान गँवा चुके हैं। भारत में भी कुल संक्रमण के मामले छह लाख को पार कर चुके हैं और 17,800  लोग अपनी जान गँवा चुके हैं। यह संख्या बड़ी है, पर विशेषज्ञों का कहना है कि यह कम है क्योंकि गणना में वे लोग शामिल नहीं जिनका टेस्ट ही नहीं हुआ। भारत ही नहीं दुनिया भर में दसियों लाख लोग ऐसे हैं जिन्हें संक्रमण हुआ, पर उन्हें पता तक न चला। तो लाखों लोग ऐसे हैं जिन्हें संक्रमण हुआ, पर उसका असर इतना हलका था कि जब तक वे टेस्ट कराने की सोचते, तब तक वे ठीक भी हो गए।

पर चिंताजनक खबर यह है कि दुनिया में जैसे-जैसे 'लॉकडाउन' खोलकर कामकाज को पुराने ढर्रे पर लाने की अनुमति मिलने लगी है, संक्रमित लोगों की संख्या में इजाफा होता जा रहा है। कई अनेक जगह जैसे चीन में, जहाँ इस पर काबू पा लिया गया था, फिर से मामले सामने आने लगे हैं। आखिर कब थमेगा यह सिलसिला? कब तक बनेगा इससे बचने के कारगर उपाय के रूप में टीका और वह टीका भी कितना असरदार होगा; उसका असर कब तक रहेगा और जैसी कि खबरें आई हैं कि कोरोना का यह मौजूदा वायरस 'म्यूटेट' हो रहा है यानी जेनेटिक स्तर पर बदल रहा है, तो क्या नए विकसित रूपों से भी टीका निपट पाएगा?

चिंता यह भी है कि जितनी संख्या में टीकों की जरूरत होगी, क्या उतने फटाफट बन पाएंगे? एक सवाल यह भी है कि उसकी कीमत क्या होगी और क्या आम लोग तक उसकी पहुंच होगी? खबरें आई हैं कि दुनिया का सबसे अमीर देश अमेरिका 'डॉलर' के बलबूते आने वाले टीकों पर अपना 'पहला' अधिकार बनाने का इंतजाम कर चुका है। उसके लिए इसका कोई मतलब नहीं कि विश्व स्वास्थ्य संगठन ने अपील की थी कि टीका 'सार्वजनिक संपत्ति' होनी चाहिए। फ़िलहाल दुनिया में टीका-विकास के 129 प्रयास चल रहे हैं जिनमें से 12 मानव परीक्षण के दौर में हैं और अनुमान है कि साल के अंत तक आपद इस्तेमाल के लिए कोई-न-कोई टीका तैयार हो जाएगा। पर अभी तक केवल चीन ने घोषणा की है कि अगर उसका टीका तीसरे मानव परीक्षण में कामयाब होता है, तो वह सबके लिए उपलब्ध होगा यानी उस पर पेटेंट की बंदिश नहीं होगी। टीके की दौड़ में वह काफी आगे भी है। पर चूंकि चीन में पर्याप्त संख्या में अब संक्रमण नहीं हो रहा इसलिए वह मानव-परीक्षण के लिए ब्राज़ील, कनाडा आदि देशों पर निर्भर है।  

पर टीके को लेकर असली चिंता यह है कि विश्व में जितने भी टीके इस समय विकसित किए जा रहे हैं, वे सब उस वायरस के आधार पर तैयार किए जा रहे हैं जो वुहान (चीन) से निकला था जिससे यह शंका स्वाभाविक रूप से उठती है कि क्या ये टीके 'म्यूटेट' हो रहे वायरस के खिलाफ सचमुच कामयाब होंगे। कोविड-19 की कोई सटीक दवा अभी नहीं और किसी नई दवा का ईजाद करना तो बहुत ही समयसाध्य होता है। फ़िलहाल पहले से इस्तेमाल हो रही दवाएं—चाहे वे पेट के कीड़े मारने वाली हों या एचआईवी/एड्स के खिलाफ एंटीवायरल दवाओं का मिश्रण हों या फ्लू की दवा हों या मलेरिया की या इबोला की या केवल स्टेरॉयड—हर किसी को आजमाया जा रहा है जो आंशिक रूप से ही सफल हो रही हैं। 

इन सबकी तुलना में संक्रमण के बाद स्वस्थ हो चुके व्यक्ति के प्लाज्मा से हासिल एन्टीबॉडी के आधार पर चिकित्सा, अपेक्षाकृत अधिक सफल  हो रही है।    

एक बात गौरतलब है, बैक्टीरिया के संक्रमण से दवाएं आसानी से निपट लेती हैं, पर वैसा वायरस के मामले में नहीं होता। वायरस के मामले में 'ब्रॉड स्पेक्ट्रम' वाली बात भी नहीं होती कि एक ही दवा बहुत तरह के वायरसों से निपट ले। हर विशिष्ट वायरस के लिए एकदम अलग ही दवा खोजनी होती है। 

पर संक्रमित व्यक्ति के रक्त में वायरस से लड़ने के लिए स्वाभाविक रूप से जो एन्टीबॉडी पैदा होती हैं, वे नई सटीक दवा विकसित करने के लिए उपयुक्त मूल सामग्री के रूप में इस्तेमाल हो सकती हैं। इसलिए बहुतेरे वैज्ञानिकों का मानना है कि मानव एन्टीबॉडी के आधार पर दवा विकसित करने की टेक्नोलॉजी विकसित करने पर ही सबसे अधिक ध्यान दिया जाना चाहिए क्योंकि इससे भविष्य में भी संभावित नए वायरसों से निपटना आसान होगा।  

फ़िलहाल इलाज के लिए  'एन्टीबॉडी' की उपलब्धता प्लाज्मा के जरिए ही हो रही है। इसकी सफलता की खबरें अनेक देशों से आ रही हैं। इनमें हाल में दिल्ली के स्वास्थ्यमंत्री सत्येंद्र जैन की चिकित्सा का किस्सा भी जुड़ गया है। 55-वर्षीय मंत्री को अचानक तेज बुखार और सांस की तकलीफ हुई। कोरोना टेस्ट कराया तो रिपोर्ट 'नेगेटिव' थी यानी कोरोना का संक्रमण नहीं था। पर हालत बिगड़ती गई। दुबारा टेस्ट कराया तो टेस्ट 'पॉजिटिव' था यानी वे कोरोना से संक्रमित थे। तब तक उनके रक्त में ऑक्सीजन की मात्रा बहुत घट गई और उन्हें आई.सी.यू. (गहन चिकित्सा कक्ष) में भेजना पड़ा। पर जब उनको कोरोना संक्रमण से स्वस्थ हो चुके एक वालंटियर का प्लाज़्मा चढ़ाया गया तो जादू की तरह 12 घंटे में उनका बुखार उतर गया, ऑक्सीजन देने की भी जरूरत नहीं रही और तीन दिन में तो वे यमदूत को 'टाटा' करके हॉस्पिटल से मुस्कराते हुए बाहर आ गए।  

वे तो आम आदमी पार्टी के नेता थे। पर आम आदमी के लिए स्वस्थ हो चुके व्यक्तियों का प्लाज्मा हासिल करना आसान नहीं होता। इसकी किल्लत के चलते कुछ देशों में तो प्लाज्मा की कालाबाजारी शुरू हो चुकी है। लंदन के 'द गार्डियन' अखबार में छपी एक खबर के मुताबिक पाकिस्तान में तो प्लाज्मा की कीमत 3,800 ब्रिटिश पौंड (साढ़े तीन लाख रुपए) तक पहुँच चुकी है और किसी अमीर मरीज के अस्पताल में घुसते ही प्लाज्मा के दलाल चक्कर काटने लग जाते हैं। वहां इसे 'चमत्कारी' इलाज का दर्जा मिल चुका है।

उधर, अमेरिका सहित अनेक विकसित देशों में प्लाज्मा दान करने वाले वॉलंटियरों को खोजने और उन्हें पंजीकृत करने के लिए टेक्नोलॉजी की मदद ली जा रही है। माइक्रोसॉफ्ट ने इसके लिए एक ऍप भी जारी किया है और लोग स्वेच्छा से प्लाज्मा दान करने के लिए इसमें खुद को पंजीकृत करा रहे हैं।

दिल्ली में भारत का पहला प्लाज्मा बैंक खुल चुका है और मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल स्वस्थ हो चुके लोगों से अपील कर रहे हैं कि वे प्लाज्मा दान करें। ऐसा करके वे लोगों की जान बचा सकते हैं। यह बड़ा पुण्य का काम होगा। 


उधर, अनेक बायोटेक कम्पनियाँ भी अपने अनुसंधान के लिए 'प्लाज्मा' बटोरने में जुटी हैं और हजारों नमूनों में से यह खोज रही हैं कि रक्त में मौजूद तमाम तरह की ' एन्टीबॉडीज' में से आखिर कौन-सी ' एन्टीबॉडी' ऐसी है जो 'कोरोनावायरस' का सबसे प्रभावी ढंग से काम तमाम करती है। इस काम में दिलचस्पी रखने वाली अनेक निजी कंपनियों ने आपस में सहयोग करने के लिए ''कोव-आईजी-19'  नाम से एक प्लाज्मा सहयोग समूह (अलायन्स) भी बना लिया है। 'बिल एन्ड मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन' भी इसकी मदद कर रहा है।

इस अलायंस की एक भागीदार जापानी कंपनी 'ताकेदा फार्मास्युटिकल' की बात मानें तो मौजूदा प्रयासों के चलते कोई-न-कोई एन्टीबॉडी-आधारित दवा इस साल के अंत तक आ जानी चाहिए। इसके वैज्ञानिकों का दावा है कि वे ऐसी दवा बनाने की चेष्टा में हैं जो म्यूटेट हो चुके सभी वायरसों से निपट सके। उम्मीद जताई जा रही है कि इसको लेकर विश्वस्तरीय ट्रायल जुलाई में ही शुरू हो जाएगा और अगले साल जनवरी तक दवा बाजार में सुलभ होगी। आज ऐसी बायोटेक प्रविधियां मौजूद हैं ही, जिनसे किसी चुनिंदा ' एन्टीबॉडी' का बड़े पैमाने पर उत्पादन किया जा सकता है।

इन सब प्रयासों के बीच सबसे दिलचस्प खबर यह है कि एक बायोटेक फर्म ने एक जीन-संशोधित (जेनेटिकली मॉडिफाइड) गाय से इंसानी 'एन्टीबॉडी' तैयार करके दिखाई है। ज्यादातर बायोटेक कंपनियां मोनोक्लोनल (एकल) एंटीबाडी तैयार करने में लगी हैं; पर गाय से जो एंटीबाडी मिलती है, उसका दर्जा 'पॉलीक्लोनल एंटीबाडी' का होता है। जहां मोनोक्लोनल एंटीबाडी वायरस के किसी एक भाग पर हमला करके उसका नाश करती है, वहीँ 'पॉलीक्लोनल एंटीबाडी' की खासियत होगी कि वह वायरस के विविध हिस्सों पर हमला कर सकेगी और उसके बचने का कोई रास्ता नहीं छोड़ेगी। इस काम से जुड़े वैज्ञानिक इसे अधिक प्रकृति-सम्मत तरीका मान रहे हैं। और सबसे बड़ी बात यह कि यह भविष्य में वायरस के म्यूटेट हो जाने पर भी असरदार बनी रह सकती है।  

गाय को एन्टीबॉडी  फैक्ट्री के रूप में इस्तेमाल करने का फायदा यह कि एक गाय हर महीने सैंकड़ों मरीजों के उपचार के लिए एन्टीबॉडी  बनाकर दे सकती है। इस काम से जुड़ी कंपनी 'सैब बायोथेराप्यूटिक्स' के वैज्ञानिकों का दावा है कि परखनली अध्ययनों में इंसान से हासिल एन्टीबॉडी की तुलना में गाय से हासिल की गई एन्टीबॉडी  चार गुना अधिक असरदार पाई गई है। पर कई वैज्ञानिक गाय से एन्टीबॉडी हासिल करने को सबसे अच्छी युक्ति नहीं मानते। उनकी पहली आपत्ति यह है कि सीधे किसी पशु से पैदा की गई एन्टीबॉडी  आज तक किसी भी बीमारी के लिए स्वीकृत नहीं हुई।  

पर इसके ठीक विपरीत सेंट लुई स्थित 'वाशिंगटन युनिवर्सिटी स्कूल ऑफ़ मेडिसिन' के संक्रामक रोग विशेषज्ञ जेफ्री हैंडरसन का मानना है कि गाय से निर्मित एन्टीबॉडी  तार्किक रूप से मानव एन्टीबॉडी का ही अगला विकासीय चरण है। इसके समर्थन में मजबूत वैज्ञानिक आधार भी है इसलिए इस दिशा में काम तेज किया जाना चाहिए।  

(This article was first published in Hindi Newspaper 'Vaigyanik Drishtikon' on 01-07-2020. It has been mildly updated with a couple of new information.)

Sunday, May 17, 2020

कोविड -19 की दवा और टीका, दोनों तरह इस्तेमाल हो सकते हैं 'मोनोक्लोनल एंटीबाडी'

विनोद वार्ष्णेय


सामान्यतः, हर व्यक्ति एक शक्तिशाली प्रतिरक्षा प्रणाली से लैस होता है जो रोग पैदा करने वाले वायरसों और बैक्टीरिया से उसे बचाती है। बीमारियों से भरी दुनिया में जीवित रहना इसी से संभव होता है।  फिर ऐसा क्या है कि 'सार्स-कोव-2' नामक वायरस से पैदा हुई बीमारी 'कोविड-19' से रक्षा नहीं हो पा रही।  उससे होने वाली मौतें थमने का नाम नहीं ले रहीं। 212 देशों में इसका प्रकोप पहुँच चुका है। संक्रमित हो चुके लोगों का आंकड़ा पैंतालीस लाख और मरने वालों की संख्या तीन लाख से ऊपर पहुँच चुकी है। भारत में भी 53 दिनों के लॉक-डाउन के बावजूद संक्रमित लोगों की संख्या बढ़ती जा रही है। इस मामले में भारत चीन से आगे निकल गया है हालांकि मृत्यु दर चीन के मुकाबले कम है।


वैश्विक अर्थव्यवस्था में इससे जो हड़कंप मचा है, उससे सभी चिंतित हैं। विश्व भर में करीब 3-5 ट्रिलियन डालर की क्षति पहुँचने की आशंका जताई जा रही है। ढाई माइक्रोन के इस वायरस का आतंक इतना कि विश्व की लगभग आठ अरब आबादी में से संभवतः 5 अरब आबादी को इसके भय से हफ़्तों घरों में कैद रहना पड़ा। इससे पूरी तरह निपटने में विज्ञान निरीह सा लगता है। यह इस बात को भी इंगित करता है कि जीव विज्ञान के रहस्यों को जानने-समझने के मामले में  विज्ञान अभी बहुत पीछे है। 


दवाएं और टीके विकसित करने के लिए विश्व भर की तमाम सक्षम प्रयोगशालाओं में अद्भुत होड़ मची है। ऐसी होड़ इससे पहले कभी नहीं देखी गई। जिज्ञासा यह भी है कि यदि भविष्य में 'कोई'.. 'कभी'… 'किसी' वायरस को जैविक हथियार के रूप में इस्तेमाल करे, तो हमारा मौजूदा विज्ञान उससे निपटने के उपाय कितनी जल्दी तैयार करके दे सकता है। रक्षा अनुसन्धान से जुड़े वैज्ञानिकों और शोध-नीति निर्माताओं का सपना है कि ऐसी वैज्ञानिक विधियां विकसित होनी चाहिए कि किसी भी नए वायरस से निपटने का इलाज एक महीने में निकल आए। पर, अभी तो हालत यह है कि नई दवा या टीका विकसित करने में वर्षों लग जाते हैं। 


दिलचस्प बात यह कि प्रकृति तो हमारी मदद करती है। किसी भी वायरस का हमला होते ही शरीर की  सहज रोग प्रतिरक्षा प्रणाली एक खास किस्म की प्रोटीन बनाने लगती है जिसे 'इम्यूनोग्लोब्युलिन' या 'एन्टीबॉडी' कहते हैं। लेकिन समस्या यह है कि यह चीज किसी नए वायरस के मामले में देर से बनना शुरू होती हैं क्योंकि शरीर को इसका कोई पूर्ववर्ती अनुभव नहीं होता और फिर बनती भी हैं तो जरूरी नहीं कि ये समुचित मात्रा में बनें। अगर ये एंटीबाडी अपेक्षित मात्रा में नहीं बन पाएं और वायरस खतरनाक किस्म का हो तो व्यक्ति यमदूत के हवाले हो जाता है। मौजूदा कोविड-19 के मामले में भी यही हो रहा है; और मौतों का सिलसिला थम नहीं रहा।


वैज्ञानिक जमात प्रकृति के रहस्यों को समझकर, उस ज्ञान को  तार्किक ढंग से इस्तेमाल कर नए-नए हल खोज कर देती रहती है। इसी क्रम में अभी हाल में कुछ वैज्ञानिकों ने दावा किया कि मानव शरीर में बनने वाली ‘एंटीबाडी’ के आधार पर अपेक्षाकृत कम समय में दवाएं बनाई जा सकती हैं जो न केवल टीके की तरह काम कर सकती हैं बल्कि संक्रमित हो चुके व्यक्ति को भी फटाफट ठीक कर सकती हैं। एंटीबाडी की कार्यप्रणाली यह है कि वह पहले वायरस की पहचान कर लेती है और फिर उसकी मानव  कोशिकाओं में घुसने (यानी संक्रमित करने) की क्षमता ख़त्म कर देती है। हल इतना आसान प्रतीत होता है, पर दिक्क्तें बहुत हैं।


‘एंटीबाडी’ हासिल करने के दो तरीके हैं--या तो शरीर इन्हें बनाकर दे या ये इन्हें किसी बाहरी स्रोत से हासिल किया जाए। प्लाज्मा चिकित्सा में 'एंटीबाडी' संक्रमण से उबर चुके मरीज के रक्त से हासिल की जाती हैं जो रक्त के प्लाज्मा (तरल हिस्से) में मौजूद होती हैं। प्लाज्मा से 'एंटीबाडी' हासिल कर कोविड-19 के अनेक गंभीर मरीजों को भारत सहित अनेक देशों में रोग-मुक्त किया जा चुका है। लेकिन इस चिकित्सा में कई खामियां भी हैं। एक यह कि सहज रूप से मानव रक्त में बन रही 'एंटीबॉडी' कई किस्म की होती हैं। प्लाज्मा में जलन और सूजन पैदा करने वाले और रक्त में थक्का जमाने वाले आदि कई किस्म के जैविक अणु भी होते हैं। इसलिए कुछेक मामलों में गंभीर हालत में पहुँच चुके मरीज को 'प्लाज्मा थेरैपी' से भी बचाना संभव नहीं होता।  मुंबई के लीलावती अस्पताल में एक 53-वर्षीय मरीज के मामले में ऐसा हो भी चुका है। इसके अलावा महामारी के दिनों में मरीजों की विशाल संख्या देखते हुए समुचित मात्रा में प्लाज्मा हासिल करना कैसे संभव है ! 


इसलिए वैज्ञानिकों की दिलचस्पी इस बात में है कि जो एक सबसे उपयोगी एंटीबॉडी हो, उसका जेनेटिक इंजीनियरिंग से बड़े पैमाने पर उत्पादन किया जाए।  खुशखबरी यह है कि दो देशों, नीदरलैंड और इजराइल, की प्रयोगशालाओं में वैज्ञानिकों को उस विशिष्ट एंटीबाडी (मोनोक्लोनल एंटीबाडी) को बनाने में कामयाबी मिली है जो मौजूदा कोरोना वायरस की संक्रमित करने की क्षमता ख़त्म कर देती है। प्रसिद्ध विज्ञान पत्रिका ‘नेचर कम्युनिकेशन्स' में नीदरलैंड की प्रयोगशाला की कामयाबी से जुड़ा शोधपत्र पिछले हफ्ते ही प्रकाशित हुआ है। इसके कुछ ही दिन बाद इजराइल के रक्षामंत्री नफ्ताली बेनिट ने भी अपने देश के सैनिक तंत्र से जुड़ी एक प्रयोगशाला, 'इंस्टिट्यूट फॉर बायोलॉजिकल रिसर्च' में हासिल इसी किस्म की कामयाबी की घोषणा की।


उक्त घोषणाओं के दो दिनों के अंदर भारत की ‘कौंसिल ऑफ़ साइंटिफिक एन्ड इंडस्ट्रियल रिसर्च’ने भी अपने  'न्यू मिलेनियम इंडियन टेक्नोलॉजी लीडरशिप इनिशिएटिव' कार्यक्रम के तहत मोनोक्लोनल एंटीबाडी बनाने से जुड़ी एक परियोजना की जानकारी दी। इस परियोजना के तहत भारत में 'मोनोक्लोनल एंटीबाडी' बनाने की टेक्नोलॉजी विकसित करने के लिए अन्य देशों की ही तरह निजी क्षेत्र और सरकारी क्षेत्र की प्रयोगशालाएं मिलकर काम करेंगी। ‘नेशनल सेंटर फॉर सैल साइंसेज’ (पुणे), ‘इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ़ टेक्नोलॉजी’ (इंदौर) और निजी क्षेत्र की 'पैड-ओमिक्स टेक्नोलॉजीज' को अनुसंधान और विकास का काम सौंपा गया है। देश की प्रमुख टीका निर्माता कंपनी  'भारत बायोटेक' इसमें अग्रणी मार्गदर्शक की भूमिका निभाएगी।


‘भारत बायोटेक’के चेयरमैन कृष्णा एल्ला का बयान है कि इस परियोजना पर तेजी से काम होगा जिससे अगले छह महीने में एंटीबाडी बनाने की स्वदेशी टेक्नोलॉजी विकसित हो सके। उन्होंने यह भी जानकारी दी कि भारत में विकसित की जाने वाली टेक्नोलॉजी नीदरलैंड और इजराइल की टेक्नोलॉजी से भिन्न होगी। आम जानकारी है कि वायरस परिवर्तित (म्यूटेट) होता रहता है, इसलिए कोई गारंटी नहीं होती कि एक किस्म की एंटीबॉडी निरंतर विकसित हो रहे वायरस के परवर्ती रूपों से भी निपट ले। इसलिए लक्ष्य है कि भारतीय प्रयोगशालाएं विविध किस्म की मोनोक्लोनल एंटीबाडी का एक ऐसा मिश्रण (कॉकटेल) तैयार करें जो ‘सार्स-कोव-2’ के विविध किस्म के परिवर्तित रूपों के खिलाफ भी असरदार हों।


वायरस से होने वाली बीमारियों के बचाव के लिए सामान्यतः स्वीकार्य तरीका, टीका ही माना जाता है। पर, टीका स्वस्थ व्यक्ति के लिए होता है। इससे व्यक्ति को वायरस के किसी भावी हमले से सुरक्षा मिलती है। लेकिन रोगग्रस्त हो जाने पर इसकी उतनी उपयोगिता नहीं रह जाती। इसके अलावा उच्च रक्तचाप, मधुमेह या गुर्दे व सांस की समस्याओं से पीड़ित व्यक्तियों या वृध्द व्यक्तियों पर टीके का असर संदिग्ध रहता है। माना जा रहा है कि मोनोक्लोनल एंटीबाडी आधारित दवाएं इस किस्म के रोगियों में भी उपयोगी रहेंगी।


वैसे, मोनोक्लोनल एंटीबाडी आधारित चिकित्सा कोई एकदम नई या अनप्रयुक्त चीज नहीं है। रक्त और स्तन कैंसर में तो दो दशक से इसका इस्तेमाल किया जा रहा है। न रुकने वाला रक्तस्राव कर देने वाले खतरनाक 'इबोला' वायरस के मामले में भी 'मोनोक्लोनल एंटीबाडी' आधारित दवाएं कामयाब सिद्ध हो चुकी हैं। 


नीदरलैंड की यूट्रेक्ट यूनिवर्सिटी स्थित 'यूट्रेक्ट मॉलिक्युलर इम्यूनोलॉजी हब' में किए गए प्रयोगों से यह सामने आया है कि विकसित की गई मोनोक्लोनल एंटीबाडी न केवल कोविड -19, बल्कि कहीं अधिक घातक बीमारी 'सार्स' से निपटने में भी उतनी ही कारगर होगी।


लेकिन ये प्रायोगिक 'मोनोक्लोनल एंटीबाडी' चूहे से विकसित की गई है। यह अचरज की बात है कि मानव-सरीखी मोनोक्लोनल एंटीबॉडी का उत्पादन चूहे कर सकते हैं। वस्तुतः मानव मोनोक्लोनल एंटीबॉडी का उत्पादन दो तरीकों से किया जा सकता है। एक तरीका है, चूहे में मौजूद एंटीबाडी बनाने वाले जीन को हटाकर मानव-एंटीबाडी बनाने वाले जीन डाल दिए जाएं। दूसरा है, जंगली चूहे से एंटीबाडी बनाई जाए और बाद में उसे  मानवीकृत रूप दे दिया जाए। मोनोक्लोनल एंटीबाडी चाहे मानवी हो या मानवीकृत, वह कितनी सुरक्षित है और कितनी प्रभावी है, उसकी जांच के लिए ट्रायल करने जरूरी होते हैं।


और यहाँ आकर इन्तजार लम्बा होता जाता है। कई बार तो इतनी देरी हो जाती है कि शंका होने लगती है कि उत्साहजनक वैज्ञानिक शोध की ख़बरें कहीं बढ़ाचढ़ाकर तो नहीं लिखी गई थीं।

(यह लेख पाक्षिक अखबार 'वैज्ञानिक दृष्टिकोण' के 16-05-2020 के अंक में प्रकाशित हो चुका है)

Saturday, November 16, 2019

'चिकुनगुनिया' की बूटी-आधारित जादुई दवा का मार्ग प्रशस्त


विनोद वार्ष्णेय

वैसे तो हर बीमारी नामुराद होती है लेकिन चिकुनगुनिया से लोग विशेष रूप से घबराते हैं। वजह यह है कि इसके शिकार महीनों, कभी-कभी तो सालों तक जोड़ों के भयंकर दर्द और सूजन से परेशान रहते हैं। कई बार आजीवन रहने वाली विकलांगता भी हो जाती है। तुलनात्मक रूप से यह नई बीमारी है। 1952 से पहले इसे कोई जानता न था। पहली बार 1952 में अफ्रीकी देश तंजानिया में इसका प्रकोप हुआ। लेकिन आज यह एशिया, अफ्रीका, यूरोप, अमेरिका आदि सभी महाद्वीपों में करीब 100 से ऊपर देशों में फैल चुकी है। भारत के हर राज्य में यह अपना प्रकोप फैला चुकी है। आंकड़े हैं कि हर साल भारत में इसके 10 लाख मरीज सामने आ रहे हैं। 

चिकुनगुनिया वायरस जन्य बीमारी है। इसका वायरस ‘चिकवी’ एडिस प्रजाति के मच्छर के जरिये फैलता है। यह वायरस मच्छरों या हड्डी वाले जीवों के रक्त में ही फलता-फूलता है और वहां अपनी आबादी बढ़ाता है। वैसे तो मनुष्य का अनेक तरह के वायरसों से पाला पड़ता रहता है लेकिन शरीर की रोग-प्रतिरोधक क्षमता उनसे निपटती रहती है। कुछ वायरसों जैसे फ्लू, पोलियो, हेपेटाइटिस-बी आदि से निपटने के लिए टीके बन चुके हैं तो उनके इस्तेमाल से इनसे बचाव हो जाता है। लेकिन जहाँ तक चिकवी का सवाल है, इससे न शरीर की सामान्य रोग प्रतिरोधक क्षमता निपट पाती और न इससे बचाव के लिए कोई टीका बना है।  

चिकवी से संक्रमित मच्छर जब मनुष्य को काटता है तो वायरस उसके रक्त में पहुँच जाता है। वहां से वह कोशिकाओं के अंदर घुस जाता है जहाँ वह अपने लिए तो पोषण हासिल करता है लेकिन खुद ऐसे रसायन पैदा करता है जो मनुष्य के लिए बुखार, भीषण दर्द और बेचैनी का कारण बन जाते हैं। आज दुनिया भर में इसकी कोई प्रमाणित और लइसेंस-शुदा दवा नहीं है। केवल बुखार, दर्द, सूजन आदि कम करने वाली औषधियों से मरीज को राहत दिलाने की चेष्टा की जाती है। बहरहाल दुनियाभर में इस वायरस-जन्य बीमारी से निपटने के लिए दवा विकसित करने की मांग है। 

उल्लेखनीय है कि विश्व भर में कई दशकों से वायरस या बैक्टीरिया-जन्य लाइलाज बीमारियों से निपटने के लिए वानस्पतिक स्रोतों से मिलने वाले नए-नए जैव सक्रिय यौगिकों से नई-नई दवाएं विकसित करने के उपक्रम चल रहे हैं। इसके लिए पारम्परिक चिकित्सा साहित्य या जनजातियों में उपलब्ध जानकारी का इस्तेमाल किया जाता है। इन्हीं प्रयासों के फलस्वरूप पौधों से मिलने वाले प्राकृतिक उत्पादों से ऐसे अनेक यौगिक खोजे जा चुके हैं जिनका आधुनिक दवा उद्योग में जमकर इस्तेमाल हो रहा है। अनुमान है कि आज 40% आधुनिक दवाएं प्राकृतिक स्रोतों से मिले यौगिकों से बनती हैं। उन प्राकृतिक यौगिकों को संश्लेषित करने की विधियां भी ढूंढ़ ली गई हैं। 

प्राकृतिक तथ्य है कि हर वायरस की अपनी जिजीविषा होती है और वे देर-सबेर एंटीवायरल दवाओं के खिलाफ प्रतिरोधिता विकसित कर लेते हैं और नतीजा यह कि प्रचलित दवाएं बेअसर होने लगती हैं। यही वजह है कि निरंतर नए प्रभावी यौगिकों की तलाश आज एक अनिवार्यता बन गई है। 

चिकवी वायरस से निपटने के लिए जब औषधि ढूढ़ने की बात आई तो भारत में आयुर्वेद और प्राचीन लोक औषधियों के साहित्य को खंगाला गया। पाया गया कि 'कालमेघ' नामक बूटी सूजन कम करने और बुखार उतारने में प्रयुक्त होती रही है। इसका पौधा पीले भूरे रंग का और बेहद कड़वा होता है। शरद ऋतु आने पर जमीन के ऊपर वाले हिस्से की कटाई कर ली जाती है जिसके आधार पर विभिन्न रोगों के लिए करीब 26 आयुर्वेदिक दवाइयां बनाई जा रही हैं। आधुनिक उन्नत प्रयोगशालों में किए गए विभिन्न परीक्षणों में पाया गया है कि इसका जैव-सक्रिय यौगिक 'एंड्रोग्रफोलॉइड' अनेक किस्म के वायरसों को मारने की क्षमता रखता है।  

चिकवी की दवा खोजने के क्रम में पहले के कुछ प्रयासों की चर्चा जरूरी है। वायरस की अनेक किस्में होती हैं जिनमें से चिकवी वायरस को अल्फा-वायरस प्रजाति में वर्गीकृत किया गया है। अल्फा-वायरस शरीर में  सूजन पैदा करने  और कार्टिलेज (लम्बी हड्डियों के सिरे पर मौजूद नरम ऊतक)  को क्षति पहुंचाने के लिए जाना जाता है। परीक्षणों में इस क्षति को रोकने में पेंटोसन पोलीसल्फेट नामक एक कार्बोहाइड्रेट आधारित पॉलिमर उपयोगी पाया जा चुका है।

इसी तरह पाया गया कि कृत्रिम माइक्रो-आरएनए के प्रयोग से चिकवी की प्रतिकृतियां बनाने से रोका जा सकता है। इसके अलावा वाइरस को कमजोर कर जब शरीर में प्रवेश कराया जाता है तो शरीर में उसके खिलाफ स्वतः रोग प्रतिरोधक क्षमता पैदा हो जाती है। इस आधार पर बने टीके भी आजमाए जा चुके हैं और पाया गया है कि इससे लघु और लम्बी अवधि के लिए बचाव संभव है। लेकिन हरेक में कुछ न कुछ समस्या है जिसकी वजह से चिकुनगुनिया के लिए अभी तक न कोई टीका विधिवत मंजूर हुआ है और न ही कोई दवा। इसलिए नए-नए परीक्षण और अनुसंधान जारी हैं। 

दिल्ली स्थित 'डिफेन्स इंस्टिट्यूटऑफ फिजियोलॉजी एन्ड अलाइड साइंसेज' में शोध अध्येता स्वाती गुप्ता, डॉ. लिली गंजू, डॉ. कमला प्रसाद मिश्रा और शशि बाला सिंह तथा ग्वालियर-स्थित 'डिफेंस रिसर्च एन्ड डेवलपमेंट एस्टैब्लिशमेंट' में पवन कुमार दास, मनमोहन परीदा की टीम ने कालमेघ बूटी से प्राप्त यौगिक 'एंड्रोग्रफोलाइड' का चिकुनगुनिया से संक्रमित कोशिकाओं पर परीक्षण किए तो इसे उन्होंने जादुई असर वाला पाया। उक्त वैज्ञानिकों की टीम ने पाया कि चूहों की संक्रमित कोशिकाओं पर इसका असर यह है कि जलन और बुखार पैदा करने वाले रसायनों का बनना काफी कम हो जाता है। जब इस यौगिक का असर मानव कोशिकाओं पर जांचा गया तो निष्कर्ष निकला कि वायरस की प्रतिकृतियां बननी कम हो गईं। यह भी देखा गया कि बैक्टीरिया और वायरसों से लड़ने वाली प्रतिरोधक  कोशिकाओं (इम्यून सेल्स) की संख्या बढ़ गई।  

उक्त वैज्ञानिकों ने पहली बार इस ज्ञात एंटी-वायरल यौगिक का जीवों (एल्बीनो चूहों के नवजात बच्चों) में भी परीक्षण किया और उस समूची प्रक्रिया का पता लगाया कि किस तरह यह शरीर को चिकवी वायरस से मुक्त कर देता है। आशाजनक बात यह कि यह यौगिक न केवल वायरस के जहरीले (टॉक्सिक) असर को कम करता है बल्कि रोगी में रोग प्रतिरोधक कोशिकाओं की संख्या बढाकर इस वायरस के खिलाफ लड़ने की क्षमता में वृद्धि कर देता है। माना जा सकता है कि इसके आधार पर बनी दवा न केवल रोगी को चिकुनगुनिया से मुक्त कर सकेगी बल्कि स्वस्थ व्यक्ति को दिए जाने पर संभवतः महामारी के दिनों में चिकवी संक्रमण से बचाव भी कर  सकेगी। 

लेकिन उक्त भारतीय वैज्ञानिकों का मानना है कि दवा के विधिवत विकास के लिए अभी अन्य जीवों पर इसके परीक्षण की जरूरत है। आधुनिक औषधि-विकास  पद्धति में दवा के क्लिनिकल परीक्षण मनुष्यों में भी किए जाते हैं। उक्त भारतीय अनुसंधान के बाद सम्भवतः इस दिशा में कार्यक्रम बनाए जाएंगे।  

(स्रोत: जर्नल ऑफ़ एप्लाइड माइक्रोबायोलॉजी; एशियन पैसिफिक जर्नल ऑफ़ ट्रॉपिकल मेडिसिन)


Sunday, September 22, 2019

जुर्माना लगाकर प्लास्टिक के कहर से मुक्ति नहीं पाई जा सकती !







डॉ. नीलम महेंद्र 

वैसे तो विज्ञान के सहारे मनुष्य ने पाषाण युग से लेकर आज तक मानव जीवन सरल और सुगम करने के लिए एक बहुत लंबा सफर तय किया है। इस दौरान उसने एक से एक वो उपलब्धियाँ हासिल कीं जो अस्तित्व में आने से पहले केवल कल्पना लगती थीं फिर चाहे वो बिजली से चलने वाला बल्ब हो या टीवी, फोन, रेल, हवाईजहाज, कंप्यूटर, इंटरनेट कुछ भी हो ये सभी अविष्कार वर्तमान सभ्यता को एक नई ऊंचाई, एक नया आकाश देकर मानव के जीवन में क्रांतिकारी बदलाव का कारण बने। 

1907 में जब पहली बार प्रयोगशाला में कृत्रिम "प्लास्टिक" की खोज हुई तो इसके आविष्कारक बकलैंड ने कहा था, "अगर मैं गलत नहीं हूँ तो मेरा ये अविष्कार एक नए भविष्य की रचना करेगा।" और ऐसा हुआ भी, उस वक्त प्रसिद्ध पत्रिका 'टाइम' ने अपने मुख्य पृष्ठ पर लियो बकलैंड की तसवीर छापी थी और उनकी फोटो के साथ लिखा था, "ये ना जलेगा और ना पिघलेगा।" 

और जब 80 के दशक में धीरे धीरे पॉलीथिन की थैलियों ने कपड़े के थैलों, जूट के बैग, कागज के लिफाफों की जगह लेनी शुरू की, हर आदमी मंत्र मुग्ध था। हर रंग में, हर नाप में, इससे बनी थैलियों में चाहे जितने वजन का सामान डाल लो, फटने का टेंशन नहीं । इनसे बने कप कटोरियों में जितनी गरम चाय कॉफी या सब्जी डाल लो, हाथ जलने या फैलने का डर नहीं। सामान ढोना है, खराब होने या भीगने से बचाना है, पन्नी है ना! बिजली के तार को छूना है, लेकिन बिजली के झटके से बचना है, प्लास्टिक की इंसुलेशन है ना! 

खुद वजन में बेहद हल्की परंतु वजन सहने की बेजोड़ क्षमता वाली एक ऐसी चीज हमारे हाथ लग गई थी जो लागभग हमारी हर मुश्किल का समाधान थी, हमारे हर सवाल का जवाब थी। यही नहीं, वो सस्ती सुंदर और टिकाऊ भी थी यानी कुल मिलाकर लाजवाब थी। 

लेकिन किसे पता था कि आधुनिक विज्ञान के एक वरदान के रूप में हमारे जीवन का हिस्सा बन जाने वाला यह प्लास्टिक एक दिन मानव जीवन ही नहीं सम्पूर्ण पर्यावरण के लिए भी बहुत बड़ा अभिशाप बन जाएगा। "यह न जलेगा, न पिघलेगा" जो इसका सबसे बड़ा गुण था, वही इसका सबसे बड़ा अवगुण बन जाएगा। 

जी हाँ आज जिन प्लास्टिक की थैलियों में हम बाजार से सामान लाकर आधे घंटे के इस्तेमाल के बाद ही फेंक देते हैं, उन्हें नष्ट होने में हज़ारों साल लग जाते हैं। इतना ही नहीं इस दौरान वो जहाँ भी रहें--मिट्टी में या पानी में, अपने विषैले तत्व आसपास के वातावरण में छोड़ती रहती हैं। 

नवीन शोधों में पर्यावरण और मानव जीवन को प्लास्टिक से होने वाले हानिकारक प्रभावों के सामने आने के बाद आज विश्व का लगभग हर देश इसके इस्तेमाल को सीमित करने की दिशा में कदम उठाने लगा है। भारत सरकार ने भी देशवासियों से सिंगल यूज़ प्लास्टिक यानी एक बार प्रयोग किए जाने वाले प्लास्टिक का उपयोग बन्द करने का आह्वान किया है। 

इससे पहले 2018 विश्व पर्यावरण दिवस की थीम " बीट प्लास्टिक पॉल्युशन" की मेजबानी करते हुए भी भारत ने विश्व समुदाय से सिंगल यूज़ प्लास्टिक से मुक्त होने की अपील की थी। लेकिन जिस प्रकार से आज प्लास्टिक हमारी दैनिक दिनचर्या का ही हिस्सा बन गया है, सिंगल यूज़ प्लास्टिक का उपयोग पूर्णतः बन्द हो जाना तब तक संभव नहीं है जब तक इसमें जनभागीदारी ना हो। 

क्योंकि आज मानव जीवन में प्लास्टिक की घुसपैठ कितनी ज्यादा है इस विषय पर "प्लास्टिक: अ टॉक्सिक लव स्टोरी" अर्थात प्लास्टिक, एक जहरीली प्रेम कथा, के द्वारा लेखिका सुजैन फ्रीनकेल ने बताने की कोशिश की है। 

इस किताब में उन्होंने अपने एक दिन की दिनचर्या के बारे में लिखा है कि वे 24 घंटे में ऐसी कितनी चीजों के संपर्क में आईं जो प्लास्टिक की बनी हुई थीं। इनमें प्लास्टिक के लाइट स्विच, टॉयलेट सीट, टूथब्रश, टूथपेस्ट ट्यूब जैसी 196 चीज़े थीं जबकि गैर प्लास्टिक चीजों की संख्या 102 थी। यानी स्थिति समझी जा सकती है। लेकिन जब हम जनभागीदारी की बात करते हैं तो जागरूकता एक अहम विषय बन जाता है। 

कानून द्वारा प्रतिबंधित करना या उपयोग करने पर जुर्माना लगाना इसका हल नहीं हो सकता। इसका हल है, लोगों का स्वेच्छा से इसका उपयोग न करना। यह तभी सम्भव होगा जब वो इसके प्रयोग से होने वाले दुष्प्रभावों को समझेंगे और जानेंगे। अगर आप समझ रहे हैं कि यह एक असंभव लक्ष्य है तो आप गलत हैं। यह लक्ष्य मुश्किल हो सकता है लेकिन असम्भव नहीं। इसे साबित किया है हमारे ही देश के एक राज्य ने। जी हां सिक्किम में प्लास्टिक का इस्तेमाल करने पर जुर्माना नहीं लगाया गया। बल्कि उससे होने वाली बीमारियों के बारे में अवगत कराया गया और धीरे धीरे जब लोगों ने स्वेच्छा से इसका प्रयोग कम कर लिया तो राज्य में कानून बनाकर इसे प्रतिबंधित किया गया। और सिक्किम भारत का पहला राज्य बना जिसने प्लास्टिक से बनी डिस्पोजल बैग और सिंगल यूज़ प्लास्टिक की बोतलों पर बैन लगाया।

दरअसल प्लास्टिक के दो पक्ष हैं। एक वह जो हमारे जीवन को सुविधाजनक बनाने की दृष्टि से उपयोगी है तो उसका दूसरा पक्ष स्वास्थ्य की दृष्टि से प्रदूषण फैलने वाला एक ऐसा हानिकारक तत्व जिसे रिसायकल करके दोबारा उपयोग में तो लाया जा सकता है लेकिन नष्ट नहीं किया जा सकता। अगर इसे नष्ट करने के लिए जलाया जाता है तो अत्यंत हानिकारक विषैले रसायनों को उत्सर्जित करता है, अगर मिट्टी में गाड़ा  जाता है तो हजारों हज़ारों साल यों ही दबा रहेगा अधिक से अधिक ताप से छोटे छोटे कणों में टूट जाएगा लेकिन पूर्ण रूप से नष्ट नहीं होगा। 

अगर समुद्र में डाला जाए तो वहाँ भी केवल समय के साथ छोटे छोटे टुकड़ों में टूट कर पानी को प्रदूषित करता है। इसलिए विश्व भर में ऐसे प्लास्टिक के प्रयोग को कम करने की कोशिश की जा रही है जो दोबारा इस्तेमाल में नहीं आ सकता। वर्तमान में केवल उसी प्लास्टिक के उपयोग को बढ़ावा दिया जा रहा है जिसे रिसायकल करके उपयोग में लाया जा सकता है । 

लेकिन अगर हम सोचते हैं कि इस तरह से पर्यावरण को नुकसान नहीं पहुंच रहा तो हम गलत हैं क्योंकि इसे रिसायकल करने के लिए इसे पहले पिघलाना पड़ता है और उसके बाद भी उससे वो ही चीज़ दोबारा नहीं बन सकती बल्कि उससे कम गुणवत्ता वाली वस्तु ही बन सकती है और इस पूरी प्रक्रिया में नए प्लास्टिक से एक नई वस्तु बनाने के मुकाबले उसे रिसायकल करने में 80% अधिक उर्जा का उपयोग होता है। साथ ही विषैले रसायनों की उत्पत्ति। 

किंतु बात केवल यहीं खत्म नहीं होती। अनेक रिसर्च में यह बात सामने आई है कि चाहे कोई भी प्लास्टिक हो वो अल्ट्रावॉयलेट किरणों के संपर्क में पिघलने लगता है। अमेरिका की स्टेट यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने भारत के अलावा चीन, अमेरिका, ब्राज़ील, इंडोनेशिया, केन्या, लेबनान, मेक्सिको और थाईलैंड में बेची जा रही 11 ब्रांडों की 250 बोतलों का परीक्षण किया। 2018 के इस अध्ययन के अनुसार बोतलबंद पानी के 90% नमूनों में प्लास्टिक के अवशेष पाए गए। सभी ब्रांडों के एक लीटर पानी में औसतन 325 प्लास्टिक के कण मिले। 

अपने भीतर संग्रहित जल को दूषित करने के अलावा एक बार इस्तेमाल हो जाने के बाद ये स्वयं कितने कचरे में तब्दील हो जाती हैं इसका अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि वर्ष 2016 में पूरी दुनिया में 480 अरब प्लास्टिक बोतलें खरीदी गईं। आकलन है कि दुनिया में हर मिनट 10 लाख प्लास्टिक बोतलें खरीदी जाती हैं जिनमें से 50% कचरा बन जाती हैं। 

हाल के कुछ सालों में सीरप, टॉनिक जैसी दवाइयाँ भी प्लास्टिक पैकिंग में बेची जाने लगी हैं क्योंकि एक तो यह शीशियों से सस्ती पड़ती हैं दूसरा टूटने का खतरा भी नहीं होता। लेकिन प्लास्टिक में स्टोर किए जाने के कारण इन दवाइयों के प्रतिकूल असर सामने आने लगे हैं। प्लास्टिक से होने वाले खतरों से जुड़ी चेतावनी जारी करते हुए वैज्ञानिकों ने बताया है कि प्लास्टिक की चीजों में रखे गए भोज्य पदार्थों से कैंसर और भ्रूण के विकास में बाधा संवत कई बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है।

स्पष्ट है कि वर्तमान में जिस कृत्रिम प्लास्टिक का उपयोग हो रहा है वो अपने उत्पादन से लेकर इस्तेमाल तक सभी अवस्थाओं में पर्यावरण के लिए खतरनाक है। लेकिन जिस प्रकार से आज हमारी जीवनशैली प्लास्टिक की आदि हो चुकी है इससे छुटकारा पाना ना तो आसान है और ना ही यह इसका कोई व्यवहारिक हल है। इसे व्यवहारिक बनाने के लिए लोगों के सामने प्लास्टिक का एक बेहतर विकल्प प्रस्तुत करना होगा।

दरअसल समझने वाली बात यह है कि कृत्रिम प्लास्टिक बायो डिग्रेडेबल नहीं है इसलिए हानिकारक है लेकिन बायोडिग्रेडेबल प्लास्टिक भी बनाया जा सकता है। इसकी अनेक किस्में  हैं जैसे बायोपोल, बायोडिग्रेडेबल पॉलिएस्टर एकोलेक्स, एकोजेहआर आदि या फिर बायो प्लास्टिक जो शाकाहारी तेल, मक्का स्टार्च, मटर स्टार्च, जैसे जैव ईंधन स्रोतों से प्राप्त किया जा सकता है जो कचरे में सूर्य के प्रकाश, पानी,नमी, बैक्टेरिया,एंजायमों,वायु के घर्षण, और सड़न कीटों की मदद से 47 से 90 दिनों में खत्म होकर मिट्टी में घुल जाए लेकिन यह महंगा पड़ता है इसलिए कंपनियां इसे नहीं बनातीं। 

इसलिए सरकारों को सिंगल यूज़ प्लास्टिक ही नहीं बल्कि पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने वाले हर प्रकार के नॉन बायोडिग्रेडेबल प्लास्टिक का उपयोग ही नहीं, निर्माण भी पूर्णतः प्रतिबंधित करके केवल बायोडिग्रेडेबल प्लास्टिक के निर्माण और उपयोग को बढ़ावा देना चाहिए। इससे जब कपड़े अथवा जूट के थैलों और प्लास्टिक के थैलों की कीमत में होने वाली असमानता दूर होगी तो प्लास्टिक की कम कीमत के कारण उसके प्रति लोगों का आकर्षण भी कम होगा और उसका इस्तेमाल भी।

विश्व पर्यावरण संरक्षण मूलभूत ढाँचे में बदलाव किए बिना केवल जनांदोलन से हासिल करने की सरकारों की अपेक्षा एक अधूरी कोशिश है। इसे पूर्णतः तभी हासिल किया जा सकता है जब कि प्लास्टिक बनाने वाले उद्योग भी अपने कच्चे उत्पाद में बदलाव लाकर कृत्रिम प्लास्टिक बनाना ही बन्द कर दें और केवल बायोडिग्रेडेबल प्लास्टिक का ही निर्माण करें। 

अगर हमारी सरकारें प्लास्टिक के प्रयोग से पर्यावरण को होने वाले नुकसान से ईमानदारी से लड़ना चाहती हैं तो उन्हें हर प्रकार का वो प्लास्टिक जो बिना पर्यावरण को नुकसान पहुंचाए नष्ट नहीं होता है, उसके निर्माण पर औधोगिक प्रतिबंध लगाकर केवल बायोडिग्रेडेबल प्लास्टिक के निर्माण को बढ़ावा देना होगा न कि आमजन से उसका उपयोग नहीं करने की अपील।

(लेखिका वरिष्ठ स्तंभकार हैं)



Thursday, June 27, 2019

मानव नस्ल सुधार का युग आ गया है !


विनोद वार्ष्णेय

वर्ष 2019 को इसलिए भी याद किया जाएगा कि इस साल विश्व में पहली बार दो डिजाइनर बेबीज का जन्म हुआ। ऐसा विश्व में पहली बार हुआ था कि चीन के एक वैज्ञानिक ने गर्भाधान से पहले न केवल जीन-स्तर पर भ्रूण की एडिटिंग की, बल्कि सफलतापूर्वक उस जीन-संशोधित भ्रूण से परखनली गर्भाधान (Invitro Fertilization) के जरिये शिशु भी पैदा कर दिखाए। और इस तरह ये शिशु विश्व की पहली ऐसी मानव-संतान बन गए जिनके जीन भ्रूण स्तर पर ही सम्पादित कर दुरुस्त कर दिए गए थे। 


'लूलू' और 'नाना' नाम की ये जुड़वां बच्चियां इस फरवरी को सात महीने की हो चुकी हैं और स्वस्थ हैं। उनका विकास सामान्य है। पर दुनिया के तमाम  जेनेटिक वैज्ञानिक ऐसा नहीं मानते। उन्हें चिंता सता रही है कि अवैध तरीके से पैदा की गईं इन बेबीज का आखिर हश्र क्या होगा। क्या ये सचमुच सामान्य रूप से बड़ी होंगी ? क्या ये किसी अजीबोगरीब बीमारी से ग्रस्त तो नहीं हो जाएंगी? क्या ये औसत उम्र तक जी पाएंगी ? ज्यादातर आनुवंशिक वैज्ञानिकों का मानना है कि जीन-एडिटिंग के फलस्वरूप पैदा हुई इन लड़कियों को अवांछित 'साइड-इफेक्ट्स' भुगतने पड़ेंगे।


तो कौन है यह दुष्ट वैज्ञानिक जिसने दो लड़कियां अवांछित 'साइड-इफेक्ट्स' भुगतने के लिए पैदा कर डालीं ? ये हैं अमेरिका की राइस यूनिवर्सिटी और स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी  से शिक्षित और चीन की 'सदर्न यूनिवर्सिटी ऑफ़ साइंस एन्ड टेक्नोलॉजी' के बायोलॉजी विभाग में नियुक्त असोसिएट प्रोफेसर, 'हे जियानकुई'। अनुमान लगाया जा रहा है कि या तो उन्होंने वैज्ञानिक जिज्ञासा के तहत या  प्रसिद्ध होने और इतिहास में नाम कमाने की गरज से उक्त प्रयोग किया। जो भी मूल प्रेरणा रही हो, इसकी खबर मिलते ही विश्व के वैज्ञानिक जगत में भूकम्पीय तहलका मच गया। ज्यादातर वैज्ञानिकों ने 'जियानकुई' के दुस्साहस की कड़ी निंदा की और इसे मानवता के खिलाफ अपराध करार दिया। इसे विज्ञान के दुरुपयोग की संज्ञा दी गई। 


एक दूसरा नजरिया यह रहा कि यदि इंसान पर किया गया यह पहला प्रयोग सफल होता है तो इससे भविष्य में अधिक क्षमता-संपन्न , बुद्धिमान और रोग-मुक्त ‘सुपरमैन’ पैदा किये जा सकेंगे। उन्होंने इसे इस बात की उद्घोषणा माना कि जीन संशोधन के जरिये सचमुच में नस्ल-सुधार का युग अब आ चुका है।


इतिहास में नस्ल-सुधार के समर्थक अनेक राजनीतिक और वैज्ञानिक विचारक रहे हैं जिनके विचारों को लेकर भारी विवाद हुए हैं। अधिसंख्य समाज विज्ञानी और विचारक इसे समाज के लिए खतरनाक जोखिम मानते आए हैं। इसलिए आश्चर्य नहीं कि जैसे ही 'एडिटेड जीन' वाली उक्त दो बच्चियों के जन्म की खबर उजागर हुई, अगले ही दिन से जेनेटिक वैज्ञानिकों की ओर से उक्त प्रयोग की भर्त्सना शुरू हो गई।


उक्त वैज्ञानिक ने  ‘क्रिस्पर’ नाम की जीन-एडिटिंग टेक्नोलॉजी के प्रयोग से उक्त करिश्मे को अंजाम दिया। उन्होंने बजाय कोई शर्म महसूस करने के अपनी सफलता का उल्लेख खासे गर्व से किया। यहाँ ध्यान देने योग्य बात यह है कि जेनेटिक चिकित्सा का प्रयोग साल दर साल बढ़ता जा रहा है और इसे आधुनिक विज्ञान का अनूठा वरदान माना जाने लगा है। जेनेटिक चिकित्सा से सचमुच कई असाध्य बीमारियों के ठीक होने के दावे अनुसन्धान पत्रिकाओं में आते रहते हैं। लेकिन ये सब प्रयोग व्यक्ति में जन्म के बाद हुए हैं और अगर जेनेटिक चिकित्सा का कोई अनजाना साइड-इफ़ेक्ट होता भी है तो उसे केवल वह व्यक्ति ही भोगता है। लेकिन भ्रूण स्तर पर यदि कोई जेनेटिक हेरफेर कर दी जाए तो उसका लाभ, और अगर कोई नुक्सान है तो वह, पीढ़ी दर पीढ़ी चलेगा। 


इसीलिए जेनेटिक वैज्ञानिकों में यह सर्वसम्मति है कि जब तक किसी जीन के हेरफेर के नफ़ा-नुक्सान सबंधी सभी आयामों को जान-समझ न लिया जाए तब तक भ्रूण स्तर पर इस एडिटिंग टेक्नोलॉजी का कतई इस्तेमाल नहीं होना चाहिए। पर उक्त चीनी वैज्ञानिक ने संभवतः इतिहास में नाम कमाने की लालसा से उक्त अनैतिक काम कर डाला।


पर जियानकुन खुद ऐसा नहीं मानते। वे दावा करते हैं कि उन्होंने यह काम सच्चे दिल से मानव हित में किया है। कहानी यह है कि एक पति-पत्नी युगल इस भय से औलाद नहीं कर रहा था  कि वे दोनों ही एचआईवी/एड्स संक्रमण से ग्रस्त थे। अगर वे सामान्य ढंग से सम्भोग के जरिये बच्चे पैदा करते तो बच्चों में भी  एचआईवी नामक वायरस अंतरित हो जाता जबकि जीन एडिटिंग करके जियानकुन ने उस जीन को ही हटा दिया जिसकी वजह से कोई व्यक्ति एचआईवी संक्रमण का शिकार होता है। इसलिए संशोधित जीन वाली ये लड़कियां इस वाइरस की आजीवन शिकार नहीं होंगी। 


कहने का तात्पर्य यह कि इस टेक्नोलॉजी से एचआईवी-ग्रस्त लोग भी स्वस्थ बच्चे पैदा कर सकते हैं। शायद बहुत लोगों को नहीं पता कि चीन में एचआईवी संक्रमण का काफी प्रकोप है और इस नाते यह टेक्नोलॉजी भावी पीढ़ी को एचआईवी /एड्स से बचा सकती है।     


पर ज्यादातर वैज्ञानिकों ने जियानकुन के उक्त तर्क को लचर  बताया और कहा कि जब एचआईवी/एड्स से निपटने के वैकल्पिक तरीके मौजूद हैं तो यह जोखिम भरा  प्रयोग करने की क्या जरूरत थी। ‘अगर उक्त जीन को हटा देने से बच्चों को किसी नई और अज्ञात बीमारी का जोखिम पैदा हो गया हो, तो उसका  जिम्मेवार कौन होगा?’  


इस तरह के कई वैज्ञानिक लेख छप चुके हैं जिनमें आशंका जताई गई है कि इस जीन को हटा  देने से व्यक्ति में अन्य वायरसों के संक्रमण का खतरा बढ़ सकता है। इस बात को बल देते हुए कुछ ही दिन पहले ‘एमआईटी टेक्नोलॉजी रिव्यू’ में  रिपोर्ट प्रकाशित हुई भी है कि जीन-संशोधित बच्चियां पूरा जीवन नहीं जी पाएंगी। यह निष्कर्ष इंग्लैंड में 4 लाख वॉलंटियरों के डीएनए संकलित कर बनाये गए जीन बैंक के विश्लेषण के आधार पर निकाला गया है।


इसके विपरीत एक प्रयोग में पाया गया कि चूहों में से उक्त जीन निकाल देने के बाद उनकी याददाश्त बढ़ गई। और इस आधार पर यह कयास लगाए जा रहे हैं कि ये जीन-एडिटेड बच्चियां अधिक बुद्धिमती हो सकती हैं। इसी साल फरवरी में इस जीन की एडिटिंग से मस्तिष्काघात (स्ट्रोक) की वजह से लुप्त हो चुकी याददाश्त बहाल होने की रिपोर्ट भी प्रकाशित हुई है। यह इस बात का सबूत भी है कि किसी एक विशेषता के लिए चिह्नित जीन, अन्य अनेक कामों या विशेषताओं के लिए भी जिम्मेदार होता है।    


पर विवाद दिलचस्प मोड़ लेता जा रहा है और पश्चिम के कई वैज्ञानिक यहाँ तक संदेह व्यक्त करने लगे हैं कि उक्त चीनी वैज्ञानिक की मंशा एचआईवी से निजात दिलाने की जगह अधिक बुद्धिमान बच्चे पैदा करने की रही होगी। यह भी आशंका व्यक्त की जा रही है कि अगर अधिक बुद्धिमान बच्चे पैदा करने के इस तरीके पर लोगों का विश्वास होने लगा तो जीन-एडिटिंग-आधारित परखनली शिशु पैदा करने का कारोबार जोर-शोर से चल पड़ेगा।


बहरहाल विश्व भर में जिस तरह से उक्त प्रयोग की आलोचना  हुई, उसके मद्देनज़र चीनी विश्वविद्यालय के अधिकारियों ने जियानकुन के प्रयोग को अनैतिक और वैज्ञानिक मानदंडों के खिलाफ करार देते हुए, उन्हें विश्वविद्यालय से बर्खास्त कर दिया। चर्चा यह भी है कि चीन में कुछ महीनों बाद आने वाले नए सिविल कोड में मानव-भ्रूण की जीन-एडिटिंग को बाकायदा गैरकानूनी घोषित किया जाएगा।

(The article was first published in PRESSVANI, a Hindi Magazine)


 



Thursday, December 20, 2018

Can India Truly Become the Global Pharma Leader?


 By Vinod Varshney
Organizing Secretary of the 70th Indian PharmaceuticalCongress, 
B K Sikri (second from the left) informing the media about the 
issues that plague the Indian pharma industry. 
Indian pharma industry has been growing fast over the last few years and is estimated to grow at an enhanced compound annual rate of 22.4 to reach 55 billion US dollars in the next two years. Yet there are signs of worries as numerous issues have cropped up that need to be addressed at the earliest to face the emerging new challenges. Pharma leaders believe that there is immense potential in India to become the global pharma leader and supplier of quality drugs at an affordable price to the world.

This year’s Indian Pharmaceutical Congress, which is the 70th in its history is going to address all the issues and challenges that lie ahead in the path of achieving Pharma Vision 2030 which is aimed at establishing India as the global pharma leader. The issues range from generic formulations, biosimilars, e-pharmacy to better regulatory enforcement, adequate investment in research and development of new molecules and many more.

The Congress will be inaugurated by the vice president of India, Shri Venkaih Naidu on December 21 and would continue up to December 23 at the Amity University campus, Noida.

According to local organizing Secretary B R Sikri, there are several things that would be happening for the first time in the Congress. The most important of them is a face-to-face discussion between representatives of the regulatory bodies and industry captains. Around 50 CEOs of the pharmaceutical companies along with regulators and pharma associations would be participating in this much-awaited exercise. ‘Developing efficient regulatory mechanism and its enforcement is important if India has to retain its role as an exporter of medicines to 195 countries across the world.  Today sixty percent of the medicines that are manufactured in India are exported,’ says Sikri.

Regulatory issues apart, the industry faces a major challenge of research and development. This is an accepted fact that the investment and expenditure on Research and Development in the sector are not adequate. To make the Indian pharma industry more self-reliant the research and development outlay needs to increase. An example is often cited that the Indian pharmaceutical industry depends massively on Chinese intermediates. This dependence is as high as 80 percent. If due to any reason whatsoever China bans this supply to India, the entire industry might come to a grinding halt. Should India not undertake enough R&D to become self-reliant—is a question needs to be addressed sooner than later.

The issues relevant to Indian pharma industry have been smartly chosen in the form of various technical sessions that have been suitably arranged over the three days in the Congress. The organizers inform that useful ideas and solutions that would emerge from the free and frank discussion in an open environment would be forwarded to the government in the form of recommendations.

The discussions in the Congress would be wide-ranging and of global standards. Around 125 eminent speakers are coming from abroad. The event is expected to be mammoth in its size as 6,000 delegates from India and abroad are billed to participate.

Amity University chancellor Dr. Ashok Chauhan is especially proud of providing its campus as the venue of the Congress for the second time within five years. The Congress is being organized by the Indian Pharmaceutical Congress Association, a federation of five professional pharmaceutical bodies and hosted by Indian Pharmacy Graduates Association.


Thursday, November 1, 2018

बच्चों ने अपनी आँखों देखा कैसा होता है डीएनए

विनोद वार्ष्णेय 

जीवन का आधार ‘डीएनए’ विस्मयकारी रासायनिक अणु है। कितने लोगों ने अपनी आंखों से डीएनए देखा है ? और कितने लोग जानते व मानते  हैं कि इंसान का आधा डीएनए संरचना में बिलकुल केले के डीएनए जैसा है? लखनऊ के एक स्कूल के 550 बच्चों ने अभी हाल में सामूहिक प्रयोग के दौरान केले से खुद डीएनए निकाल कर देखा और डीएनए के इतिहास और संरचना के बारे में जानने की कोशिश की। बहुत चीजें है डीएनए के बारे में जानने- समझने की। कुछ बातें यहाँ :

डीएनए किसी भी वनस्पति, वायरस, बैक्टीरिया, पशु और मानव, सभी जीवधारियों के जीवन का मूल सारतत्व होता है। इससे जुड़े अनुसंधान ने बायोटेक्नोलॉजी के क्षेत्र में क्रांति ला दी है। आज बायोटेक्नोलॉजी उद्योग 400 अरब अमरीकी डालर का हो चुका है। अफ़सोस यह कि इसमें भारत की हिस्सेदारी महज 2 प्रतिशत है। योजनाकारों का सपना है, 2025 तक इसे 13 प्रतिशत तक ले जाया जाए। इसके लिए न केवल कपनियों और सरकारों को अनुसन्धान व्यय बढ़ाना होगा बल्कि तेज दिमाग वाली कुशल मानव शक्ति की भी जरूरत होगी। जरूरी है कि प्रतिभाशाली बच्चों को कम उम्र से ही आण्विक जीवविज्ञान के प्रति आकर्षित जाए।

बच्चों में आण्विक जीव विज्ञान के प्रति ललक पैदा करने की दृष्टि से वह प्रशंसनीय दिन था जब लखनऊ के जी डी गोयनका पब्लिक स्कूल में एक साथ 550 स्कूली बच्चों ने केले के टुकड़ों से डीएनए निकाल कर दिखाया। यह वैज्ञानिक प्रयोग चौथे 'इंडिया इंटरनेशनल साइंस फेस्टिवल' की एक छोटी सी गतिविधि थी जिसका आयोजन विज्ञान प्रौद्योगिकी मंत्रालय और पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय ने विज्ञान भारती के सहयोग से 5 से 8 अक्टूबर के बीच वैज्ञानिक विषयों पर जागरूकता पैदा करने के उद्देश्य से किया। लेकिन मॉडल-प्रदर्शनी, लब्ध-प्रतिष्ठ वैज्ञानिकों के व्याख्यान, पैनल चर्चा, कार्यशालाएं आदि तमाम अन्य कार्यक्रमों की तुलना में समस्त मीडिया में डीएनए वाली खबर को ही ज्यादा स्थान मिला क्योंकि यह एक नया वर्ड रिकॉर्ड भी बना था। गिनिस वर्ल्ड रिकॉर्ड्स के अनुसार इससे पहले पिछले साल फरवरी में अमेरिका के 'सिएटल रिसर्च सेंटर' में एक साथ 302 स्कूली बच्चों ने स्ट्रॉबेरी के गूदे से डीएनए निकालने का वैज्ञानिक प्रयोग करने का विश्व रिकॉर्ड कायम किया था।

प्रयोग  की चीफ इंस्ट्रक्टर 'इंस्टीट्यूट ऑफ़ फारेस्ट जेनेटिक्स एंड ट्री ब्रीडिंग' की वैज्ञानिक डा. मधुमिता दासगुप्ता बताती हैं कि डीएनए शब्द आज आमफहम है, विद्यार्थी इसके बारे में अखबारों, इंटरनेट यहाँ तक कि उपन्यासों तक में  पढ़ते हैं, लेकिन यह कैसा दिखता है, इसका काम क्या है, इसका इतिहास क्या है आदि चीजों के बारे में वे नहीं जानते। इस तरह के प्रयोग करना विज्ञान सीखने का सहज और प्रभावी तरीका है। कक्षा में रेखांकन, पावर पॉइंट और व्याख्यान से विज्ञान के प्रति वह आत्मीयता नहीं बन पाती। उक्त प्रयोग में 13 से लेकर 17 साल की उम्र के विद्यार्थी शामिल थे। दसवीं कक्षा तक विद्यार्थी डीएनए के बारे में कुछ न कुछ जान चुके होते हैं। उनको इसकी संरचना के बारे में पढ़ाया जाता है, पर यह गलत धारणा बनी रहती है कि डीएनए की सरंचना कुंडली रूप में दो लिपटे हुए धागे जैसे दिखाई देगी। प्रयोग के दौरान विद्यार्थियों को आश्चर्य हुआ होगा कि केले से निकला डीएनए तो सफेद रंग के धागे का गिलगिले गूदे जैसा है।

फेस्टीवल आयोजकों का मानना है कि खुद अपने हाथों से प्रयोग करके उन विद्यार्थियों में बायोटेक्नोलॉजी के प्रति उत्सुकता और उत्साह का अद्भुत संचार हुआ होगा। उनमें से कुछ जरूर भविष्य में विज्ञान को अपना पेशा बनाएंगे। यह तो तय है कि अधिकांश बच्चों के लिए यह जीवन भर अविस्मरणीय दिन बना रहेगा। वस्तुतः इस तरह के आयोजन देश भर में जगह-जगह होने चाहिए।

डीएनए (डीऑक्सीराइबो न्यूक्लिइक एसिड) की विस्मयजनक बात यह कि यह निर्जीव रासायनिक अणु है, पर जीवन की समस्त क्रियाओं के लिए जरूरी है। डीएनए की खोज बहुत प्राचीन नहीं है। इसकी शुरूआती परिकल्पना सबसे पहले 1868 में स्विट्ज़रलैंड के डाक्टर और जीव वैज्ञानिक जोहानीज फ्रेड्रिख़ मीशा ने प्रस्तुत की थी। बाद में 1944 में ओसवाल्ड एव्री ने न्यूमोनिया के लिए जिम्मेवार न्यूमोकोकल बैक्टीरिया में प्रायोगिक रूप से यह सिद्ध कर दिखाया कि डीएनए ही वह अणु है जो आनुवंशिक गुणों को आगे संततियों में पहुंचाता है। 1953 में एक नई क्रांतिकारी उपलब्धि हासिल हुई जब अमरीकी आनुवंशिकीविद और अणु जीवविज्ञानी जेम्स वाटसन और ब्रिटिश न्यूरोसाइंटिस्ट व अणु जीवविज्ञानी फ्रांसिस क्रिक ने डीएनए की संरचना उद्घाटित की  जिसे उन्होंने आपस में दोहरी कुंडली की तरह लिपटे धागे जैसा बताया। 


वैज्ञानिक मानते हैं  कि डीएनए के अस्तित्व में आने के बाद से पृथ्वी पर जीवन के विकासक्रम में तेजी आई। मानव के सन्दर्भ में तो डीएनए और भी रुचिकर विषय है। हर व्यक्ति का व्यवहार, शक्ल-सूरत, कद-काठी, क्षमताएं, जीवन प्रत्याशा, स्वास्थ्य आदि इन्हीं डीएनए पर निर्भर है। मानव के शरीर में करीब 37 खरब (ट्रिलियन) कोशिकाएं होती हैं जो शरीर की समस्त प्रक्रियाओं को आजीवन संचालित करती रहती हैं। ये निरंतर मरती रहती हैं और नई बनती रहती हैं। पर नई कोशिकाएं भी वही काम करती रहती हैं जो मर चुकी कोशिकाएं करती आई थीं। इन कोशिकाओं के केन्द्रक (न्यूक्लियस) में ही डीएनए अवस्थित रहता है।

यह बात सूक्ष्म जीवों, पशुओं और पेड़ पौधों के लिए भी उतनी ही सच है। यह कहना गलत न होगा कि जीवन की कुंजी डीएनए में है। बिना इसके जीव अपनी पुनरुत्पत्ति नहीं कर सकता। जीवन को जिस रूप में हम देखते, पाते हैं, वह डीएनए के बिना संभव नहीं। पृथ्वी पर किसी किस्म के जीवन का अस्तित्व ही न होता अगर प्राकृतिक परिस्थितियों के विकास क्रम में कोई 400 करोड़ साल पहले पहला डीएनए (डीऑक्सीराइबो नुक्लिइक एसिड) अस्तित्व में न आया होता। पर, उससे भी पहले आरएनए (राइबो नुक्लिइक एसिड) पृथ्वी पर बन चुका था। अगर आरएनए न बना होता तो डीएनए भी न बनता। गहन जिज्ञासा का विषय यह कि इस पृथ्वी पर जीवों का अस्तित्व संभव बनाने के लिए आवश्यक ये नुक्लिइक एसिड आखिर पृथ्वी पर ही क्यों बने। वे क्यों बने और कैसे बने ?

अमेरिकी आनुवंशिकीविद एन एच होरोवित्ज़ ने मंगल गृह पर जीवन की सम्भावना तलाशने के लिए परीक्षण का ब्लूप्रिंट बनाया था और इसके लिए बड़ा नाम कमाया।  उनकी यह अवधारणा भी मशहूर हुई कि जीवन के विकास के लिए तीन अनिवार्य शर्तें हैं: पहली, अपने आप की ठीक हूबहू प्रतिलिपि बनाने की क्षमता होना; दूसरी, अपने गिर्द परिस्थितियों  को इस तरह प्रभावित करने की क्षमता होना जिससे कि अपने जीवन के लिए जरूरी सामग्री  निरंतर मिलती रहे; और तीसरी, नई  परिस्थितियों के अनुरूप अपने आप में परिवर्तन लाने की क्षमता होना। आधुनिक विज्ञान के अनुसार जीवन एक ऐसी रासायनिक प्रणाली है जो खुद-ब-खुद विकसित होने की क्षमता रखती है। पर किसके बलबूते? यह सब डीएनए के अंदर मौजूद करोड़ों निर्देशों से ही संभव होता है। विकास-क्रम में जब डीएनए एक ऐसे अणु के रूप में सामने आया जो अपनी प्रतिलिपि बनाने में कामयाब था तो इससे जीवन विकास की प्रक्रिया तेज हुई। विकास क्रम में बहुत बाद में जाकर कोशिकाओं का उद्भव हुआ।

पिछले चार दशकों में निरंतर डीएनए आधारित अनुप्रयोगी अनुसन्धान होते रहे हैं और अनेकानेक उपयोगी तकनीकें विकसित हुई हैं। बलात्कार, हत्या, पितृत्व की पुष्टि आदि मामलों में डीएनए फिंगर प्रिंटिंग टेक्नोलॉजी की भूमिका के बारे में तो बहुत लोग जानते हैं। डीएनए के आधार पर बीमारियों के निदान के लिए नए-नए नैदानिक (डायग्नोस्टिक) तरीके भी विकसित हो रहे हैं। जड़ी बूटी आधारित औषधि निर्माण के लिए विशुद्धता परखने के लिए भी डीएनए सबसे विश्वसनीय टूल बन चुका है। वायरस जनित रोगों के खिलाफ टीके विकसित करने के लिए भी वायरस की सही प्रजाति-पहचान के लिए भी डीएनए को अलग करके देखा जाता है। जीन चिकित्सा की संभावनाएं तो दिन-ब-दिन प्रबल होती जा रही हैं। अब तो आधुनिक अनुसंधान की बदौलत सिंथेटिक जीवविज्ञान का युग शुरू होने वाला है जो प्रकृति में कहीं न पाए जाने वाले कृत्रिम डीएनए-सृजन  पर आधारित होगा। इनके नए व्यावहारिक उपयोग भी सामने आएंगे।

उम्मीद करनी चाहिए कि आज जो किशोर-किशोरियां डीएनए के रहस्य पर विस्मित होंगे, उनमें से जरूर कुछ कल के नए जीव विज्ञान में अपनी भूमिका निभाने की क्षमता अर्जित कर दिखाएंगे। 

डीएनए निकालने की किट भारत में ही बनी

विश्व भर में चर्चित हुए बच्चों के इस प्रयोग से जुड़ा एक अन्य पहलू भी हैं। इस परीक्षण के लिए जिस किट का इस्तेमाल किया गया, उसका विकास कोयंबटूर स्थित 'इंस्टीट्यूट ऑफ़ फारेस्ट जेनेटिक्स एंड ट्री ब्रीडिंग' की वैज्ञानिक डा. मधुमिता दासगुप्ता ने अपनी एक विद्यार्थी सहयोगी राधा वलुताक्कल के साथ मिलकर किया था। इसका अनुसंधान 2008 में हो गया था, 2009 में इसे पेटेंट कराया गया और 2017 में अनेक सुधार के बाद व्यावसायिक तौर पर 'आर्बरईजी' नाम से इसे बाजार में उतारा गया। इस नए किट के विकास की जरूरत इसलिए पड़ी कि बाजार में उपलब्ध किट सूखे पेड़ पत्ती से डीएनए नहीं निकाल पाते थे। वे केवल नरम और ताजा फलों, सब्जियों के लिए ही उपयुक्त थे। पर यह भारतीय किट अन्य उपलब्ध किटों से किफायती और बेहतर है। लेकिन इंडिया इंटरनेशनल साइंस फेस्टिवल में जो किट प्रयुक्त किया गया,  उसमें उक्त प्रयोग के नजरिये से विशेष परिवर्तन किये गए। 
डीएनए कोशिकाओं के अंदर होता है और इसे निकलने के लिए पहला काम कोशिकाओं के बाहरी आवरण को तोड़ना होता है। इसके लिए बनाये गए रासायनिक घोल (बफर) का विकास इसी संस्थान में किया गया।

(इस लेख का कुछ अंश 'आउटलुक' मैगज़ीन में प्रकाशित  हो चुका  है)