Saturday, November 16, 2019

'चिकुनगुनिया' की बूटी-आधारित जादुई दवा का मार्ग प्रशस्त


विनोद वार्ष्णेय

वैसे तो हर बीमारी नामुराद होती है लेकिन चिकुनगुनिया से लोग विशेष रूप से घबराते हैं। वजह यह है कि इसके शिकार महीनों, कभी-कभी तो सालों तक जोड़ों के भयंकर दर्द और सूजन से परेशान रहते हैं। कई बार आजीवन रहने वाली विकलांगता भी हो जाती है। तुलनात्मक रूप से यह नई बीमारी है। 1952 से पहले इसे कोई जानता न था। पहली बार 1952 में अफ्रीकी देश तंजानिया में इसका प्रकोप हुआ। लेकिन आज यह एशिया, अफ्रीका, यूरोप, अमेरिका आदि सभी महाद्वीपों में करीब 100 से ऊपर देशों में फैल चुकी है। भारत के हर राज्य में यह अपना प्रकोप फैला चुकी है। आंकड़े हैं कि हर साल भारत में इसके 10 लाख मरीज सामने आ रहे हैं। 

चिकुनगुनिया वायरस जन्य बीमारी है। इसका वायरस ‘चिकवी’ एडिस प्रजाति के मच्छर के जरिये फैलता है। यह वायरस मच्छरों या हड्डी वाले जीवों के रक्त में ही फलता-फूलता है और वहां अपनी आबादी बढ़ाता है। वैसे तो मनुष्य का अनेक तरह के वायरसों से पाला पड़ता रहता है लेकिन शरीर की रोग-प्रतिरोधक क्षमता उनसे निपटती रहती है। कुछ वायरसों जैसे फ्लू, पोलियो, हेपेटाइटिस-बी आदि से निपटने के लिए टीके बन चुके हैं तो उनके इस्तेमाल से इनसे बचाव हो जाता है। लेकिन जहाँ तक चिकवी का सवाल है, इससे न शरीर की सामान्य रोग प्रतिरोधक क्षमता निपट पाती और न इससे बचाव के लिए कोई टीका बना है।  

चिकवी से संक्रमित मच्छर जब मनुष्य को काटता है तो वायरस उसके रक्त में पहुँच जाता है। वहां से वह कोशिकाओं के अंदर घुस जाता है जहाँ वह अपने लिए तो पोषण हासिल करता है लेकिन खुद ऐसे रसायन पैदा करता है जो मनुष्य के लिए बुखार, भीषण दर्द और बेचैनी का कारण बन जाते हैं। आज दुनिया भर में इसकी कोई प्रमाणित और लइसेंस-शुदा दवा नहीं है। केवल बुखार, दर्द, सूजन आदि कम करने वाली औषधियों से मरीज को राहत दिलाने की चेष्टा की जाती है। बहरहाल दुनियाभर में इस वायरस-जन्य बीमारी से निपटने के लिए दवा विकसित करने की मांग है। 

उल्लेखनीय है कि विश्व भर में कई दशकों से वायरस या बैक्टीरिया-जन्य लाइलाज बीमारियों से निपटने के लिए वानस्पतिक स्रोतों से मिलने वाले नए-नए जैव सक्रिय यौगिकों से नई-नई दवाएं विकसित करने के उपक्रम चल रहे हैं। इसके लिए पारम्परिक चिकित्सा साहित्य या जनजातियों में उपलब्ध जानकारी का इस्तेमाल किया जाता है। इन्हीं प्रयासों के फलस्वरूप पौधों से मिलने वाले प्राकृतिक उत्पादों से ऐसे अनेक यौगिक खोजे जा चुके हैं जिनका आधुनिक दवा उद्योग में जमकर इस्तेमाल हो रहा है। अनुमान है कि आज 40% आधुनिक दवाएं प्राकृतिक स्रोतों से मिले यौगिकों से बनती हैं। उन प्राकृतिक यौगिकों को संश्लेषित करने की विधियां भी ढूंढ़ ली गई हैं। 

प्राकृतिक तथ्य है कि हर वायरस की अपनी जिजीविषा होती है और वे देर-सबेर एंटीवायरल दवाओं के खिलाफ प्रतिरोधिता विकसित कर लेते हैं और नतीजा यह कि प्रचलित दवाएं बेअसर होने लगती हैं। यही वजह है कि निरंतर नए प्रभावी यौगिकों की तलाश आज एक अनिवार्यता बन गई है। 

चिकवी वायरस से निपटने के लिए जब औषधि ढूढ़ने की बात आई तो भारत में आयुर्वेद और प्राचीन लोक औषधियों के साहित्य को खंगाला गया। पाया गया कि 'कालमेघ' नामक बूटी सूजन कम करने और बुखार उतारने में प्रयुक्त होती रही है। इसका पौधा पीले भूरे रंग का और बेहद कड़वा होता है। शरद ऋतु आने पर जमीन के ऊपर वाले हिस्से की कटाई कर ली जाती है जिसके आधार पर विभिन्न रोगों के लिए करीब 26 आयुर्वेदिक दवाइयां बनाई जा रही हैं। आधुनिक उन्नत प्रयोगशालों में किए गए विभिन्न परीक्षणों में पाया गया है कि इसका जैव-सक्रिय यौगिक 'एंड्रोग्रफोलॉइड' अनेक किस्म के वायरसों को मारने की क्षमता रखता है।  

चिकवी की दवा खोजने के क्रम में पहले के कुछ प्रयासों की चर्चा जरूरी है। वायरस की अनेक किस्में होती हैं जिनमें से चिकवी वायरस को अल्फा-वायरस प्रजाति में वर्गीकृत किया गया है। अल्फा-वायरस शरीर में  सूजन पैदा करने  और कार्टिलेज (लम्बी हड्डियों के सिरे पर मौजूद नरम ऊतक)  को क्षति पहुंचाने के लिए जाना जाता है। परीक्षणों में इस क्षति को रोकने में पेंटोसन पोलीसल्फेट नामक एक कार्बोहाइड्रेट आधारित पॉलिमर उपयोगी पाया जा चुका है।

इसी तरह पाया गया कि कृत्रिम माइक्रो-आरएनए के प्रयोग से चिकवी की प्रतिकृतियां बनाने से रोका जा सकता है। इसके अलावा वाइरस को कमजोर कर जब शरीर में प्रवेश कराया जाता है तो शरीर में उसके खिलाफ स्वतः रोग प्रतिरोधक क्षमता पैदा हो जाती है। इस आधार पर बने टीके भी आजमाए जा चुके हैं और पाया गया है कि इससे लघु और लम्बी अवधि के लिए बचाव संभव है। लेकिन हरेक में कुछ न कुछ समस्या है जिसकी वजह से चिकुनगुनिया के लिए अभी तक न कोई टीका विधिवत मंजूर हुआ है और न ही कोई दवा। इसलिए नए-नए परीक्षण और अनुसंधान जारी हैं। 

दिल्ली स्थित 'डिफेन्स इंस्टिट्यूटऑफ फिजियोलॉजी एन्ड अलाइड साइंसेज' में शोध अध्येता स्वाती गुप्ता, डॉ. लिली गंजू, डॉ. कमला प्रसाद मिश्रा और शशि बाला सिंह तथा ग्वालियर-स्थित 'डिफेंस रिसर्च एन्ड डेवलपमेंट एस्टैब्लिशमेंट' में पवन कुमार दास, मनमोहन परीदा की टीम ने कालमेघ बूटी से प्राप्त यौगिक 'एंड्रोग्रफोलाइड' का चिकुनगुनिया से संक्रमित कोशिकाओं पर परीक्षण किए तो इसे उन्होंने जादुई असर वाला पाया। उक्त वैज्ञानिकों की टीम ने पाया कि चूहों की संक्रमित कोशिकाओं पर इसका असर यह है कि जलन और बुखार पैदा करने वाले रसायनों का बनना काफी कम हो जाता है। जब इस यौगिक का असर मानव कोशिकाओं पर जांचा गया तो निष्कर्ष निकला कि वायरस की प्रतिकृतियां बननी कम हो गईं। यह भी देखा गया कि बैक्टीरिया और वायरसों से लड़ने वाली प्रतिरोधक  कोशिकाओं (इम्यून सेल्स) की संख्या बढ़ गई।  

उक्त वैज्ञानिकों ने पहली बार इस ज्ञात एंटी-वायरल यौगिक का जीवों (एल्बीनो चूहों के नवजात बच्चों) में भी परीक्षण किया और उस समूची प्रक्रिया का पता लगाया कि किस तरह यह शरीर को चिकवी वायरस से मुक्त कर देता है। आशाजनक बात यह कि यह यौगिक न केवल वायरस के जहरीले (टॉक्सिक) असर को कम करता है बल्कि रोगी में रोग प्रतिरोधक कोशिकाओं की संख्या बढाकर इस वायरस के खिलाफ लड़ने की क्षमता में वृद्धि कर देता है। माना जा सकता है कि इसके आधार पर बनी दवा न केवल रोगी को चिकुनगुनिया से मुक्त कर सकेगी बल्कि स्वस्थ व्यक्ति को दिए जाने पर संभवतः महामारी के दिनों में चिकवी संक्रमण से बचाव भी कर  सकेगी। 

लेकिन उक्त भारतीय वैज्ञानिकों का मानना है कि दवा के विधिवत विकास के लिए अभी अन्य जीवों पर इसके परीक्षण की जरूरत है। आधुनिक औषधि-विकास  पद्धति में दवा के क्लिनिकल परीक्षण मनुष्यों में भी किए जाते हैं। उक्त भारतीय अनुसंधान के बाद सम्भवतः इस दिशा में कार्यक्रम बनाए जाएंगे।  

(स्रोत: जर्नल ऑफ़ एप्लाइड माइक्रोबायोलॉजी; एशियन पैसिफिक जर्नल ऑफ़ ट्रॉपिकल मेडिसिन)


Sunday, September 22, 2019

जुर्माना लगाकर प्लास्टिक के कहर से मुक्ति नहीं पाई जा सकती !







डॉ. नीलम महेंद्र 

वैसे तो विज्ञान के सहारे मनुष्य ने पाषाण युग से लेकर आज तक मानव जीवन सरल और सुगम करने के लिए एक बहुत लंबा सफर तय किया है। इस दौरान उसने एक से एक वो उपलब्धियाँ हासिल कीं जो अस्तित्व में आने से पहले केवल कल्पना लगती थीं फिर चाहे वो बिजली से चलने वाला बल्ब हो या टीवी, फोन, रेल, हवाईजहाज, कंप्यूटर, इंटरनेट कुछ भी हो ये सभी अविष्कार वर्तमान सभ्यता को एक नई ऊंचाई, एक नया आकाश देकर मानव के जीवन में क्रांतिकारी बदलाव का कारण बने। 

1907 में जब पहली बार प्रयोगशाला में कृत्रिम "प्लास्टिक" की खोज हुई तो इसके आविष्कारक बकलैंड ने कहा था, "अगर मैं गलत नहीं हूँ तो मेरा ये अविष्कार एक नए भविष्य की रचना करेगा।" और ऐसा हुआ भी, उस वक्त प्रसिद्ध पत्रिका 'टाइम' ने अपने मुख्य पृष्ठ पर लियो बकलैंड की तसवीर छापी थी और उनकी फोटो के साथ लिखा था, "ये ना जलेगा और ना पिघलेगा।" 

और जब 80 के दशक में धीरे धीरे पॉलीथिन की थैलियों ने कपड़े के थैलों, जूट के बैग, कागज के लिफाफों की जगह लेनी शुरू की, हर आदमी मंत्र मुग्ध था। हर रंग में, हर नाप में, इससे बनी थैलियों में चाहे जितने वजन का सामान डाल लो, फटने का टेंशन नहीं । इनसे बने कप कटोरियों में जितनी गरम चाय कॉफी या सब्जी डाल लो, हाथ जलने या फैलने का डर नहीं। सामान ढोना है, खराब होने या भीगने से बचाना है, पन्नी है ना! बिजली के तार को छूना है, लेकिन बिजली के झटके से बचना है, प्लास्टिक की इंसुलेशन है ना! 

खुद वजन में बेहद हल्की परंतु वजन सहने की बेजोड़ क्षमता वाली एक ऐसी चीज हमारे हाथ लग गई थी जो लागभग हमारी हर मुश्किल का समाधान थी, हमारे हर सवाल का जवाब थी। यही नहीं, वो सस्ती सुंदर और टिकाऊ भी थी यानी कुल मिलाकर लाजवाब थी। 

लेकिन किसे पता था कि आधुनिक विज्ञान के एक वरदान के रूप में हमारे जीवन का हिस्सा बन जाने वाला यह प्लास्टिक एक दिन मानव जीवन ही नहीं सम्पूर्ण पर्यावरण के लिए भी बहुत बड़ा अभिशाप बन जाएगा। "यह न जलेगा, न पिघलेगा" जो इसका सबसे बड़ा गुण था, वही इसका सबसे बड़ा अवगुण बन जाएगा। 

जी हाँ आज जिन प्लास्टिक की थैलियों में हम बाजार से सामान लाकर आधे घंटे के इस्तेमाल के बाद ही फेंक देते हैं, उन्हें नष्ट होने में हज़ारों साल लग जाते हैं। इतना ही नहीं इस दौरान वो जहाँ भी रहें--मिट्टी में या पानी में, अपने विषैले तत्व आसपास के वातावरण में छोड़ती रहती हैं। 

नवीन शोधों में पर्यावरण और मानव जीवन को प्लास्टिक से होने वाले हानिकारक प्रभावों के सामने आने के बाद आज विश्व का लगभग हर देश इसके इस्तेमाल को सीमित करने की दिशा में कदम उठाने लगा है। भारत सरकार ने भी देशवासियों से सिंगल यूज़ प्लास्टिक यानी एक बार प्रयोग किए जाने वाले प्लास्टिक का उपयोग बन्द करने का आह्वान किया है। 

इससे पहले 2018 विश्व पर्यावरण दिवस की थीम " बीट प्लास्टिक पॉल्युशन" की मेजबानी करते हुए भी भारत ने विश्व समुदाय से सिंगल यूज़ प्लास्टिक से मुक्त होने की अपील की थी। लेकिन जिस प्रकार से आज प्लास्टिक हमारी दैनिक दिनचर्या का ही हिस्सा बन गया है, सिंगल यूज़ प्लास्टिक का उपयोग पूर्णतः बन्द हो जाना तब तक संभव नहीं है जब तक इसमें जनभागीदारी ना हो। 

क्योंकि आज मानव जीवन में प्लास्टिक की घुसपैठ कितनी ज्यादा है इस विषय पर "प्लास्टिक: अ टॉक्सिक लव स्टोरी" अर्थात प्लास्टिक, एक जहरीली प्रेम कथा, के द्वारा लेखिका सुजैन फ्रीनकेल ने बताने की कोशिश की है। 

इस किताब में उन्होंने अपने एक दिन की दिनचर्या के बारे में लिखा है कि वे 24 घंटे में ऐसी कितनी चीजों के संपर्क में आईं जो प्लास्टिक की बनी हुई थीं। इनमें प्लास्टिक के लाइट स्विच, टॉयलेट सीट, टूथब्रश, टूथपेस्ट ट्यूब जैसी 196 चीज़े थीं जबकि गैर प्लास्टिक चीजों की संख्या 102 थी। यानी स्थिति समझी जा सकती है। लेकिन जब हम जनभागीदारी की बात करते हैं तो जागरूकता एक अहम विषय बन जाता है। 

कानून द्वारा प्रतिबंधित करना या उपयोग करने पर जुर्माना लगाना इसका हल नहीं हो सकता। इसका हल है, लोगों का स्वेच्छा से इसका उपयोग न करना। यह तभी सम्भव होगा जब वो इसके प्रयोग से होने वाले दुष्प्रभावों को समझेंगे और जानेंगे। अगर आप समझ रहे हैं कि यह एक असंभव लक्ष्य है तो आप गलत हैं। यह लक्ष्य मुश्किल हो सकता है लेकिन असम्भव नहीं। इसे साबित किया है हमारे ही देश के एक राज्य ने। जी हां सिक्किम में प्लास्टिक का इस्तेमाल करने पर जुर्माना नहीं लगाया गया। बल्कि उससे होने वाली बीमारियों के बारे में अवगत कराया गया और धीरे धीरे जब लोगों ने स्वेच्छा से इसका प्रयोग कम कर लिया तो राज्य में कानून बनाकर इसे प्रतिबंधित किया गया। और सिक्किम भारत का पहला राज्य बना जिसने प्लास्टिक से बनी डिस्पोजल बैग और सिंगल यूज़ प्लास्टिक की बोतलों पर बैन लगाया।

दरअसल प्लास्टिक के दो पक्ष हैं। एक वह जो हमारे जीवन को सुविधाजनक बनाने की दृष्टि से उपयोगी है तो उसका दूसरा पक्ष स्वास्थ्य की दृष्टि से प्रदूषण फैलने वाला एक ऐसा हानिकारक तत्व जिसे रिसायकल करके दोबारा उपयोग में तो लाया जा सकता है लेकिन नष्ट नहीं किया जा सकता। अगर इसे नष्ट करने के लिए जलाया जाता है तो अत्यंत हानिकारक विषैले रसायनों को उत्सर्जित करता है, अगर मिट्टी में गाड़ा  जाता है तो हजारों हज़ारों साल यों ही दबा रहेगा अधिक से अधिक ताप से छोटे छोटे कणों में टूट जाएगा लेकिन पूर्ण रूप से नष्ट नहीं होगा। 

अगर समुद्र में डाला जाए तो वहाँ भी केवल समय के साथ छोटे छोटे टुकड़ों में टूट कर पानी को प्रदूषित करता है। इसलिए विश्व भर में ऐसे प्लास्टिक के प्रयोग को कम करने की कोशिश की जा रही है जो दोबारा इस्तेमाल में नहीं आ सकता। वर्तमान में केवल उसी प्लास्टिक के उपयोग को बढ़ावा दिया जा रहा है जिसे रिसायकल करके उपयोग में लाया जा सकता है । 

लेकिन अगर हम सोचते हैं कि इस तरह से पर्यावरण को नुकसान नहीं पहुंच रहा तो हम गलत हैं क्योंकि इसे रिसायकल करने के लिए इसे पहले पिघलाना पड़ता है और उसके बाद भी उससे वो ही चीज़ दोबारा नहीं बन सकती बल्कि उससे कम गुणवत्ता वाली वस्तु ही बन सकती है और इस पूरी प्रक्रिया में नए प्लास्टिक से एक नई वस्तु बनाने के मुकाबले उसे रिसायकल करने में 80% अधिक उर्जा का उपयोग होता है। साथ ही विषैले रसायनों की उत्पत्ति। 

किंतु बात केवल यहीं खत्म नहीं होती। अनेक रिसर्च में यह बात सामने आई है कि चाहे कोई भी प्लास्टिक हो वो अल्ट्रावॉयलेट किरणों के संपर्क में पिघलने लगता है। अमेरिका की स्टेट यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने भारत के अलावा चीन, अमेरिका, ब्राज़ील, इंडोनेशिया, केन्या, लेबनान, मेक्सिको और थाईलैंड में बेची जा रही 11 ब्रांडों की 250 बोतलों का परीक्षण किया। 2018 के इस अध्ययन के अनुसार बोतलबंद पानी के 90% नमूनों में प्लास्टिक के अवशेष पाए गए। सभी ब्रांडों के एक लीटर पानी में औसतन 325 प्लास्टिक के कण मिले। 

अपने भीतर संग्रहित जल को दूषित करने के अलावा एक बार इस्तेमाल हो जाने के बाद ये स्वयं कितने कचरे में तब्दील हो जाती हैं इसका अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि वर्ष 2016 में पूरी दुनिया में 480 अरब प्लास्टिक बोतलें खरीदी गईं। आकलन है कि दुनिया में हर मिनट 10 लाख प्लास्टिक बोतलें खरीदी जाती हैं जिनमें से 50% कचरा बन जाती हैं। 

हाल के कुछ सालों में सीरप, टॉनिक जैसी दवाइयाँ भी प्लास्टिक पैकिंग में बेची जाने लगी हैं क्योंकि एक तो यह शीशियों से सस्ती पड़ती हैं दूसरा टूटने का खतरा भी नहीं होता। लेकिन प्लास्टिक में स्टोर किए जाने के कारण इन दवाइयों के प्रतिकूल असर सामने आने लगे हैं। प्लास्टिक से होने वाले खतरों से जुड़ी चेतावनी जारी करते हुए वैज्ञानिकों ने बताया है कि प्लास्टिक की चीजों में रखे गए भोज्य पदार्थों से कैंसर और भ्रूण के विकास में बाधा संवत कई बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है।

स्पष्ट है कि वर्तमान में जिस कृत्रिम प्लास्टिक का उपयोग हो रहा है वो अपने उत्पादन से लेकर इस्तेमाल तक सभी अवस्थाओं में पर्यावरण के लिए खतरनाक है। लेकिन जिस प्रकार से आज हमारी जीवनशैली प्लास्टिक की आदि हो चुकी है इससे छुटकारा पाना ना तो आसान है और ना ही यह इसका कोई व्यवहारिक हल है। इसे व्यवहारिक बनाने के लिए लोगों के सामने प्लास्टिक का एक बेहतर विकल्प प्रस्तुत करना होगा।

दरअसल समझने वाली बात यह है कि कृत्रिम प्लास्टिक बायो डिग्रेडेबल नहीं है इसलिए हानिकारक है लेकिन बायोडिग्रेडेबल प्लास्टिक भी बनाया जा सकता है। इसकी अनेक किस्में  हैं जैसे बायोपोल, बायोडिग्रेडेबल पॉलिएस्टर एकोलेक्स, एकोजेहआर आदि या फिर बायो प्लास्टिक जो शाकाहारी तेल, मक्का स्टार्च, मटर स्टार्च, जैसे जैव ईंधन स्रोतों से प्राप्त किया जा सकता है जो कचरे में सूर्य के प्रकाश, पानी,नमी, बैक्टेरिया,एंजायमों,वायु के घर्षण, और सड़न कीटों की मदद से 47 से 90 दिनों में खत्म होकर मिट्टी में घुल जाए लेकिन यह महंगा पड़ता है इसलिए कंपनियां इसे नहीं बनातीं। 

इसलिए सरकारों को सिंगल यूज़ प्लास्टिक ही नहीं बल्कि पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने वाले हर प्रकार के नॉन बायोडिग्रेडेबल प्लास्टिक का उपयोग ही नहीं, निर्माण भी पूर्णतः प्रतिबंधित करके केवल बायोडिग्रेडेबल प्लास्टिक के निर्माण और उपयोग को बढ़ावा देना चाहिए। इससे जब कपड़े अथवा जूट के थैलों और प्लास्टिक के थैलों की कीमत में होने वाली असमानता दूर होगी तो प्लास्टिक की कम कीमत के कारण उसके प्रति लोगों का आकर्षण भी कम होगा और उसका इस्तेमाल भी।

विश्व पर्यावरण संरक्षण मूलभूत ढाँचे में बदलाव किए बिना केवल जनांदोलन से हासिल करने की सरकारों की अपेक्षा एक अधूरी कोशिश है। इसे पूर्णतः तभी हासिल किया जा सकता है जब कि प्लास्टिक बनाने वाले उद्योग भी अपने कच्चे उत्पाद में बदलाव लाकर कृत्रिम प्लास्टिक बनाना ही बन्द कर दें और केवल बायोडिग्रेडेबल प्लास्टिक का ही निर्माण करें। 

अगर हमारी सरकारें प्लास्टिक के प्रयोग से पर्यावरण को होने वाले नुकसान से ईमानदारी से लड़ना चाहती हैं तो उन्हें हर प्रकार का वो प्लास्टिक जो बिना पर्यावरण को नुकसान पहुंचाए नष्ट नहीं होता है, उसके निर्माण पर औधोगिक प्रतिबंध लगाकर केवल बायोडिग्रेडेबल प्लास्टिक के निर्माण को बढ़ावा देना होगा न कि आमजन से उसका उपयोग नहीं करने की अपील।

(लेखिका वरिष्ठ स्तंभकार हैं)



Thursday, June 27, 2019

मानव नस्ल सुधार का युग आ गया है !


विनोद वार्ष्णेय

वर्ष 2019 को इसलिए भी याद किया जाएगा कि इस साल विश्व में पहली बार दो डिजाइनर बेबीज का जन्म हुआ। ऐसा विश्व में पहली बार हुआ था कि चीन के एक वैज्ञानिक ने गर्भाधान से पहले न केवल जीन-स्तर पर भ्रूण की एडिटिंग की, बल्कि सफलतापूर्वक उस जीन-संशोधित भ्रूण से परखनली गर्भाधान (Invitro Fertilization) के जरिये शिशु भी पैदा कर दिखाए। और इस तरह ये शिशु विश्व की पहली ऐसी मानव-संतान बन गए जिनके जीन भ्रूण स्तर पर ही सम्पादित कर दुरुस्त कर दिए गए थे। 


'लूलू' और 'नाना' नाम की ये जुड़वां बच्चियां इस फरवरी को सात महीने की हो चुकी हैं और स्वस्थ हैं। उनका विकास सामान्य है। पर दुनिया के तमाम  जेनेटिक वैज्ञानिक ऐसा नहीं मानते। उन्हें चिंता सता रही है कि अवैध तरीके से पैदा की गईं इन बेबीज का आखिर हश्र क्या होगा। क्या ये सचमुच सामान्य रूप से बड़ी होंगी ? क्या ये किसी अजीबोगरीब बीमारी से ग्रस्त तो नहीं हो जाएंगी? क्या ये औसत उम्र तक जी पाएंगी ? ज्यादातर आनुवंशिक वैज्ञानिकों का मानना है कि जीन-एडिटिंग के फलस्वरूप पैदा हुई इन लड़कियों को अवांछित 'साइड-इफेक्ट्स' भुगतने पड़ेंगे।


तो कौन है यह दुष्ट वैज्ञानिक जिसने दो लड़कियां अवांछित 'साइड-इफेक्ट्स' भुगतने के लिए पैदा कर डालीं ? ये हैं अमेरिका की राइस यूनिवर्सिटी और स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी  से शिक्षित और चीन की 'सदर्न यूनिवर्सिटी ऑफ़ साइंस एन्ड टेक्नोलॉजी' के बायोलॉजी विभाग में नियुक्त असोसिएट प्रोफेसर, 'हे जियानकुई'। अनुमान लगाया जा रहा है कि या तो उन्होंने वैज्ञानिक जिज्ञासा के तहत या  प्रसिद्ध होने और इतिहास में नाम कमाने की गरज से उक्त प्रयोग किया। जो भी मूल प्रेरणा रही हो, इसकी खबर मिलते ही विश्व के वैज्ञानिक जगत में भूकम्पीय तहलका मच गया। ज्यादातर वैज्ञानिकों ने 'जियानकुई' के दुस्साहस की कड़ी निंदा की और इसे मानवता के खिलाफ अपराध करार दिया। इसे विज्ञान के दुरुपयोग की संज्ञा दी गई। 


एक दूसरा नजरिया यह रहा कि यदि इंसान पर किया गया यह पहला प्रयोग सफल होता है तो इससे भविष्य में अधिक क्षमता-संपन्न , बुद्धिमान और रोग-मुक्त ‘सुपरमैन’ पैदा किये जा सकेंगे। उन्होंने इसे इस बात की उद्घोषणा माना कि जीन संशोधन के जरिये सचमुच में नस्ल-सुधार का युग अब आ चुका है।


इतिहास में नस्ल-सुधार के समर्थक अनेक राजनीतिक और वैज्ञानिक विचारक रहे हैं जिनके विचारों को लेकर भारी विवाद हुए हैं। अधिसंख्य समाज विज्ञानी और विचारक इसे समाज के लिए खतरनाक जोखिम मानते आए हैं। इसलिए आश्चर्य नहीं कि जैसे ही 'एडिटेड जीन' वाली उक्त दो बच्चियों के जन्म की खबर उजागर हुई, अगले ही दिन से जेनेटिक वैज्ञानिकों की ओर से उक्त प्रयोग की भर्त्सना शुरू हो गई।


उक्त वैज्ञानिक ने  ‘क्रिस्पर’ नाम की जीन-एडिटिंग टेक्नोलॉजी के प्रयोग से उक्त करिश्मे को अंजाम दिया। उन्होंने बजाय कोई शर्म महसूस करने के अपनी सफलता का उल्लेख खासे गर्व से किया। यहाँ ध्यान देने योग्य बात यह है कि जेनेटिक चिकित्सा का प्रयोग साल दर साल बढ़ता जा रहा है और इसे आधुनिक विज्ञान का अनूठा वरदान माना जाने लगा है। जेनेटिक चिकित्सा से सचमुच कई असाध्य बीमारियों के ठीक होने के दावे अनुसन्धान पत्रिकाओं में आते रहते हैं। लेकिन ये सब प्रयोग व्यक्ति में जन्म के बाद हुए हैं और अगर जेनेटिक चिकित्सा का कोई अनजाना साइड-इफ़ेक्ट होता भी है तो उसे केवल वह व्यक्ति ही भोगता है। लेकिन भ्रूण स्तर पर यदि कोई जेनेटिक हेरफेर कर दी जाए तो उसका लाभ, और अगर कोई नुक्सान है तो वह, पीढ़ी दर पीढ़ी चलेगा। 


इसीलिए जेनेटिक वैज्ञानिकों में यह सर्वसम्मति है कि जब तक किसी जीन के हेरफेर के नफ़ा-नुक्सान सबंधी सभी आयामों को जान-समझ न लिया जाए तब तक भ्रूण स्तर पर इस एडिटिंग टेक्नोलॉजी का कतई इस्तेमाल नहीं होना चाहिए। पर उक्त चीनी वैज्ञानिक ने संभवतः इतिहास में नाम कमाने की लालसा से उक्त अनैतिक काम कर डाला।


पर जियानकुन खुद ऐसा नहीं मानते। वे दावा करते हैं कि उन्होंने यह काम सच्चे दिल से मानव हित में किया है। कहानी यह है कि एक पति-पत्नी युगल इस भय से औलाद नहीं कर रहा था  कि वे दोनों ही एचआईवी/एड्स संक्रमण से ग्रस्त थे। अगर वे सामान्य ढंग से सम्भोग के जरिये बच्चे पैदा करते तो बच्चों में भी  एचआईवी नामक वायरस अंतरित हो जाता जबकि जीन एडिटिंग करके जियानकुन ने उस जीन को ही हटा दिया जिसकी वजह से कोई व्यक्ति एचआईवी संक्रमण का शिकार होता है। इसलिए संशोधित जीन वाली ये लड़कियां इस वाइरस की आजीवन शिकार नहीं होंगी। 


कहने का तात्पर्य यह कि इस टेक्नोलॉजी से एचआईवी-ग्रस्त लोग भी स्वस्थ बच्चे पैदा कर सकते हैं। शायद बहुत लोगों को नहीं पता कि चीन में एचआईवी संक्रमण का काफी प्रकोप है और इस नाते यह टेक्नोलॉजी भावी पीढ़ी को एचआईवी /एड्स से बचा सकती है।     


पर ज्यादातर वैज्ञानिकों ने जियानकुन के उक्त तर्क को लचर  बताया और कहा कि जब एचआईवी/एड्स से निपटने के वैकल्पिक तरीके मौजूद हैं तो यह जोखिम भरा  प्रयोग करने की क्या जरूरत थी। ‘अगर उक्त जीन को हटा देने से बच्चों को किसी नई और अज्ञात बीमारी का जोखिम पैदा हो गया हो, तो उसका  जिम्मेवार कौन होगा?’  


इस तरह के कई वैज्ञानिक लेख छप चुके हैं जिनमें आशंका जताई गई है कि इस जीन को हटा  देने से व्यक्ति में अन्य वायरसों के संक्रमण का खतरा बढ़ सकता है। इस बात को बल देते हुए कुछ ही दिन पहले ‘एमआईटी टेक्नोलॉजी रिव्यू’ में  रिपोर्ट प्रकाशित हुई भी है कि जीन-संशोधित बच्चियां पूरा जीवन नहीं जी पाएंगी। यह निष्कर्ष इंग्लैंड में 4 लाख वॉलंटियरों के डीएनए संकलित कर बनाये गए जीन बैंक के विश्लेषण के आधार पर निकाला गया है।


इसके विपरीत एक प्रयोग में पाया गया कि चूहों में से उक्त जीन निकाल देने के बाद उनकी याददाश्त बढ़ गई। और इस आधार पर यह कयास लगाए जा रहे हैं कि ये जीन-एडिटेड बच्चियां अधिक बुद्धिमती हो सकती हैं। इसी साल फरवरी में इस जीन की एडिटिंग से मस्तिष्काघात (स्ट्रोक) की वजह से लुप्त हो चुकी याददाश्त बहाल होने की रिपोर्ट भी प्रकाशित हुई है। यह इस बात का सबूत भी है कि किसी एक विशेषता के लिए चिह्नित जीन, अन्य अनेक कामों या विशेषताओं के लिए भी जिम्मेदार होता है।    


पर विवाद दिलचस्प मोड़ लेता जा रहा है और पश्चिम के कई वैज्ञानिक यहाँ तक संदेह व्यक्त करने लगे हैं कि उक्त चीनी वैज्ञानिक की मंशा एचआईवी से निजात दिलाने की जगह अधिक बुद्धिमान बच्चे पैदा करने की रही होगी। यह भी आशंका व्यक्त की जा रही है कि अगर अधिक बुद्धिमान बच्चे पैदा करने के इस तरीके पर लोगों का विश्वास होने लगा तो जीन-एडिटिंग-आधारित परखनली शिशु पैदा करने का कारोबार जोर-शोर से चल पड़ेगा।


बहरहाल विश्व भर में जिस तरह से उक्त प्रयोग की आलोचना  हुई, उसके मद्देनज़र चीनी विश्वविद्यालय के अधिकारियों ने जियानकुन के प्रयोग को अनैतिक और वैज्ञानिक मानदंडों के खिलाफ करार देते हुए, उन्हें विश्वविद्यालय से बर्खास्त कर दिया। चर्चा यह भी है कि चीन में कुछ महीनों बाद आने वाले नए सिविल कोड में मानव-भ्रूण की जीन-एडिटिंग को बाकायदा गैरकानूनी घोषित किया जाएगा

(The article was first published in PRESSVANI, a Hindi Magazine)


 



Thursday, December 20, 2018

Can India Truly Become the Global Pharma Leader?


 By Vinod Varshney
Organizing Secretary of the 70th Indian PharmaceuticalCongress, 
B K Sikri (second from the left) informing the media about the 
issues that plague the Indian pharma industry. 
Indian pharma industry has been growing fast over the last few years and is estimated to grow at an enhanced compound annual rate of 22.4 to reach 55 billion US dollars in the next two years. Yet there are signs of worries as numerous issues have cropped up that need to be addressed at the earliest to face the emerging new challenges. Pharma leaders believe that there is immense potential in India to become the global pharma leader and supplier of quality drugs at an affordable price to the world.

This year’s Indian Pharmaceutical Congress, which is the 70th in its history is going to address all the issues and challenges that lie ahead in the path of achieving Pharma Vision 2030 which is aimed at establishing India as the global pharma leader. The issues range from generic formulations, biosimilars, e-pharmacy to better regulatory enforcement, adequate investment in research and development of new molecules and many more.

The Congress will be inaugurated by the vice president of India, Shri Venkaih Naidu on December 21 and would continue up to December 23 at the Amity University campus, Noida.

According to local organizing Secretary B R Sikri, there are several things that would be happening for the first time in the Congress. The most important of them is a face-to-face discussion between representatives of the regulatory bodies and industry captains. Around 50 CEOs of the pharmaceutical companies along with regulators and pharma associations would be participating in this much-awaited exercise. ‘Developing efficient regulatory mechanism and its enforcement is important if India has to retain its role as an exporter of medicines to 195 countries across the world.  Today sixty percent of the medicines that are manufactured in India are exported,’ says Sikri.

Regulatory issues apart, the industry faces a major challenge of research and development. This is an accepted fact that the investment and expenditure on Research and Development in the sector are not adequate. To make the Indian pharma industry more self-reliant the research and development outlay needs to increase. An example is often cited that the Indian pharmaceutical industry depends massively on Chinese intermediates. This dependence is as high as 80 percent. If due to any reason whatsoever China bans this supply to India, the entire industry might come to a grinding halt. Should India not undertake enough R&D to become self-reliant—is a question needs to be addressed sooner than later.

The issues relevant to Indian pharma industry have been smartly chosen in the form of various technical sessions that have been suitably arranged over the three days in the Congress. The organizers inform that useful ideas and solutions that would emerge from the free and frank discussion in an open environment would be forwarded to the government in the form of recommendations.

The discussions in the Congress would be wide-ranging and of global standards. Around 125 eminent speakers are coming from abroad. The event is expected to be mammoth in its size as 6,000 delegates from India and abroad are billed to participate.

Amity University chancellor Dr. Ashok Chauhan is especially proud of providing its campus as the venue of the Congress for the second time within five years. The Congress is being organized by the Indian Pharmaceutical Congress Association, a federation of five professional pharmaceutical bodies and hosted by Indian Pharmacy Graduates Association.


Thursday, November 1, 2018

बच्चों ने अपनी आँखों देखा कैसा होता है डीएनए

विनोद वार्ष्णेय 

जीवन का आधार ‘डीएनए’ विस्मयकारी रासायनिक अणु है। कितने लोगों ने अपनी आंखों से डीएनए देखा है ? और कितने लोग जानते व मानते  हैं कि इंसान का आधा डीएनए संरचना में बिलकुल केले के डीएनए जैसा है? लखनऊ के एक स्कूल के 550 बच्चों ने अभी हाल में सामूहिक प्रयोग के दौरान केले से खुद डीएनए निकाल कर देखा और डीएनए के इतिहास और संरचना के बारे में जानने की कोशिश की। बहुत चीजें है डीएनए के बारे में जानने- समझने की। कुछ बातें यहाँ :

डीएनए किसी भी वनस्पति, वायरस, बैक्टीरिया, पशु और मानव, सभी जीवधारियों के जीवन का मूल सारतत्व होता है। इससे जुड़े अनुसंधान ने बायोटेक्नोलॉजी के क्षेत्र में क्रांति ला दी है। आज बायोटेक्नोलॉजी उद्योग 400 अरब अमरीकी डालर का हो चुका है। अफ़सोस यह कि इसमें भारत की हिस्सेदारी महज 2 प्रतिशत है। योजनाकारों का सपना है, 2025 तक इसे 13 प्रतिशत तक ले जाया जाए। इसके लिए न केवल कपनियों और सरकारों को अनुसन्धान व्यय बढ़ाना होगा बल्कि तेज दिमाग वाली कुशल मानव शक्ति की भी जरूरत होगी। जरूरी है कि प्रतिभाशाली बच्चों को कम उम्र से ही आण्विक जीवविज्ञान के प्रति आकर्षित जाए।

बच्चों में आण्विक जीव विज्ञान के प्रति ललक पैदा करने की दृष्टि से वह प्रशंसनीय दिन था जब लखनऊ के जी डी गोयनका पब्लिक स्कूल में एक साथ 550 स्कूली बच्चों ने केले के टुकड़ों से डीएनए निकाल कर दिखाया। यह वैज्ञानिक प्रयोग चौथे 'इंडिया इंटरनेशनल साइंस फेस्टिवल' की एक छोटी सी गतिविधि थी जिसका आयोजन विज्ञान प्रौद्योगिकी मंत्रालय और पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय ने विज्ञान भारती के सहयोग से 5 से 8 अक्टूबर के बीच वैज्ञानिक विषयों पर जागरूकता पैदा करने के उद्देश्य से किया। लेकिन मॉडल-प्रदर्शनी, लब्ध-प्रतिष्ठ वैज्ञानिकों के व्याख्यान, पैनल चर्चा, कार्यशालाएं आदि तमाम अन्य कार्यक्रमों की तुलना में समस्त मीडिया में डीएनए वाली खबर को ही ज्यादा स्थान मिला क्योंकि यह एक नया वर्ड रिकॉर्ड भी बना था। गिनिस वर्ल्ड रिकॉर्ड्स के अनुसार इससे पहले पिछले साल फरवरी में अमेरिका के 'सिएटल रिसर्च सेंटर' में एक साथ 302 स्कूली बच्चों ने स्ट्रॉबेरी के गूदे से डीएनए निकालने का वैज्ञानिक प्रयोग करने का विश्व रिकॉर्ड कायम किया था।

प्रयोग  की चीफ इंस्ट्रक्टर 'इंस्टीट्यूट ऑफ़ फारेस्ट जेनेटिक्स एंड ट्री ब्रीडिंग' की वैज्ञानिक डा. मधुमिता दासगुप्ता बताती हैं कि डीएनए शब्द आज आमफहम है, विद्यार्थी इसके बारे में अखबारों, इंटरनेट यहाँ तक कि उपन्यासों तक में  पढ़ते हैं, लेकिन यह कैसा दिखता है, इसका काम क्या है, इसका इतिहास क्या है आदि चीजों के बारे में वे नहीं जानते। इस तरह के प्रयोग करना विज्ञान सीखने का सहज और प्रभावी तरीका है। कक्षा में रेखांकन, पावर पॉइंट और व्याख्यान से विज्ञान के प्रति वह आत्मीयता नहीं बन पाती। उक्त प्रयोग में 13 से लेकर 17 साल की उम्र के विद्यार्थी शामिल थे। दसवीं कक्षा तक विद्यार्थी डीएनए के बारे में कुछ न कुछ जान चुके होते हैं। उनको इसकी संरचना के बारे में पढ़ाया जाता है, पर यह गलत धारणा बनी रहती है कि डीएनए की सरंचना कुंडली रूप में दो लिपटे हुए धागे जैसे दिखाई देगी। प्रयोग के दौरान विद्यार्थियों को आश्चर्य हुआ होगा कि केले से निकला डीएनए तो सफेद रंग के धागे का गिलगिले गूदे जैसा है।

फेस्टीवल आयोजकों का मानना है कि खुद अपने हाथों से प्रयोग करके उन विद्यार्थियों में बायोटेक्नोलॉजी के प्रति उत्सुकता और उत्साह का अद्भुत संचार हुआ होगा। उनमें से कुछ जरूर भविष्य में विज्ञान को अपना पेशा बनाएंगे। यह तो तय है कि अधिकांश बच्चों के लिए यह जीवन भर अविस्मरणीय दिन बना रहेगा। वस्तुतः इस तरह के आयोजन देश भर में जगह-जगह होने चाहिए।

डीएनए (डीऑक्सीराइबो न्यूक्लिइक एसिड) की विस्मयजनक बात यह कि यह निर्जीव रासायनिक अणु है, पर जीवन की समस्त क्रियाओं के लिए जरूरी है। डीएनए की खोज बहुत प्राचीन नहीं है। इसकी शुरूआती परिकल्पना सबसे पहले 1868 में स्विट्ज़रलैंड के डाक्टर और जीव वैज्ञानिक जोहानीज फ्रेड्रिख़ मीशा ने प्रस्तुत की थी। बाद में 1944 में ओसवाल्ड एव्री ने न्यूमोनिया के लिए जिम्मेवार न्यूमोकोकल बैक्टीरिया में प्रायोगिक रूप से यह सिद्ध कर दिखाया कि डीएनए ही वह अणु है जो आनुवंशिक गुणों को आगे संततियों में पहुंचाता है। 1953 में एक नई क्रांतिकारी उपलब्धि हासिल हुई जब अमरीकी आनुवंशिकीविद और अणु जीवविज्ञानी जेम्स वाटसन और ब्रिटिश न्यूरोसाइंटिस्ट व अणु जीवविज्ञानी फ्रांसिस क्रिक ने डीएनए की संरचना उद्घाटित की  जिसे उन्होंने आपस में दोहरी कुंडली की तरह लिपटे धागे जैसा बताया। 


वैज्ञानिक मानते हैं  कि डीएनए के अस्तित्व में आने के बाद से पृथ्वी पर जीवन के विकासक्रम में तेजी आई। मानव के सन्दर्भ में तो डीएनए और भी रुचिकर विषय है। हर व्यक्ति का व्यवहार, शक्ल-सूरत, कद-काठी, क्षमताएं, जीवन प्रत्याशा, स्वास्थ्य आदि इन्हीं डीएनए पर निर्भर है। मानव के शरीर में करीब 37 खरब (ट्रिलियन) कोशिकाएं होती हैं जो शरीर की समस्त प्रक्रियाओं को आजीवन संचालित करती रहती हैं। ये निरंतर मरती रहती हैं और नई बनती रहती हैं। पर नई कोशिकाएं भी वही काम करती रहती हैं जो मर चुकी कोशिकाएं करती आई थीं। इन कोशिकाओं के केन्द्रक (न्यूक्लियस) में ही डीएनए अवस्थित रहता है।

यह बात सूक्ष्म जीवों, पशुओं और पेड़ पौधों के लिए भी उतनी ही सच है। यह कहना गलत न होगा कि जीवन की कुंजी डीएनए में है। बिना इसके जीव अपनी पुनरुत्पत्ति नहीं कर सकता। जीवन को जिस रूप में हम देखते, पाते हैं, वह डीएनए के बिना संभव नहीं। पृथ्वी पर किसी किस्म के जीवन का अस्तित्व ही न होता अगर प्राकृतिक परिस्थितियों के विकास क्रम में कोई 400 करोड़ साल पहले पहला डीएनए (डीऑक्सीराइबो नुक्लिइक एसिड) अस्तित्व में न आया होता। पर, उससे भी पहले आरएनए (राइबो नुक्लिइक एसिड) पृथ्वी पर बन चुका था। अगर आरएनए न बना होता तो डीएनए भी न बनता। गहन जिज्ञासा का विषय यह कि इस पृथ्वी पर जीवों का अस्तित्व संभव बनाने के लिए आवश्यक ये नुक्लिइक एसिड आखिर पृथ्वी पर ही क्यों बने। वे क्यों बने और कैसे बने ?

अमेरिकी आनुवंशिकीविद एन एच होरोवित्ज़ ने मंगल गृह पर जीवन की सम्भावना तलाशने के लिए परीक्षण का ब्लूप्रिंट बनाया था और इसके लिए बड़ा नाम कमाया।  उनकी यह अवधारणा भी मशहूर हुई कि जीवन के विकास के लिए तीन अनिवार्य शर्तें हैं: पहली, अपने आप की ठीक हूबहू प्रतिलिपि बनाने की क्षमता होना; दूसरी, अपने गिर्द परिस्थितियों  को इस तरह प्रभावित करने की क्षमता होना जिससे कि अपने जीवन के लिए जरूरी सामग्री  निरंतर मिलती रहे; और तीसरी, नई  परिस्थितियों के अनुरूप अपने आप में परिवर्तन लाने की क्षमता होना। आधुनिक विज्ञान के अनुसार जीवन एक ऐसी रासायनिक प्रणाली है जो खुद-ब-खुद विकसित होने की क्षमता रखती है। पर किसके बलबूते? यह सब डीएनए के अंदर मौजूद करोड़ों निर्देशों से ही संभव होता है। विकास-क्रम में जब डीएनए एक ऐसे अणु के रूप में सामने आया जो अपनी प्रतिलिपि बनाने में कामयाब था तो इससे जीवन विकास की प्रक्रिया तेज हुई। विकास क्रम में बहुत बाद में जाकर कोशिकाओं का उद्भव हुआ।

पिछले चार दशकों में निरंतर डीएनए आधारित अनुप्रयोगी अनुसन्धान होते रहे हैं और अनेकानेक उपयोगी तकनीकें विकसित हुई हैं। बलात्कार, हत्या, पितृत्व की पुष्टि आदि मामलों में डीएनए फिंगर प्रिंटिंग टेक्नोलॉजी की भूमिका के बारे में तो बहुत लोग जानते हैं। डीएनए के आधार पर बीमारियों के निदान के लिए नए-नए नैदानिक (डायग्नोस्टिक) तरीके भी विकसित हो रहे हैं। जड़ी बूटी आधारित औषधि निर्माण के लिए विशुद्धता परखने के लिए भी डीएनए सबसे विश्वसनीय टूल बन चुका है। वायरस जनित रोगों के खिलाफ टीके विकसित करने के लिए भी वायरस की सही प्रजाति-पहचान के लिए भी डीएनए को अलग करके देखा जाता है। जीन चिकित्सा की संभावनाएं तो दिन-ब-दिन प्रबल होती जा रही हैं। अब तो आधुनिक अनुसंधान की बदौलत सिंथेटिक जीवविज्ञान का युग शुरू होने वाला है जो प्रकृति में कहीं न पाए जाने वाले कृत्रिम डीएनए-सृजन  पर आधारित होगा। इनके नए व्यावहारिक उपयोग भी सामने आएंगे।

उम्मीद करनी चाहिए कि आज जो किशोर-किशोरियां डीएनए के रहस्य पर विस्मित होंगे, उनमें से जरूर कुछ कल के नए जीव विज्ञान में अपनी भूमिका निभाने की क्षमता अर्जित कर दिखाएंगे। 

डीएनए निकालने की किट भारत में ही बनी

विश्व भर में चर्चित हुए बच्चों के इस प्रयोग से जुड़ा एक अन्य पहलू भी हैं। इस परीक्षण के लिए जिस किट का इस्तेमाल किया गया, उसका विकास कोयंबटूर स्थित 'इंस्टीट्यूट ऑफ़ फारेस्ट जेनेटिक्स एंड ट्री ब्रीडिंग' की वैज्ञानिक डा. मधुमिता दासगुप्ता ने अपनी एक विद्यार्थी सहयोगी राधा वलुताक्कल के साथ मिलकर किया था। इसका अनुसंधान 2008 में हो गया था, 2009 में इसे पेटेंट कराया गया और 2017 में अनेक सुधार के बाद व्यावसायिक तौर पर 'आर्बरईजी' नाम से इसे बाजार में उतारा गया। इस नए किट के विकास की जरूरत इसलिए पड़ी कि बाजार में उपलब्ध किट सूखे पेड़ पत्ती से डीएनए नहीं निकाल पाते थे। वे केवल नरम और ताजा फलों, सब्जियों के लिए ही उपयुक्त थे। पर यह भारतीय किट अन्य उपलब्ध किटों से किफायती और बेहतर है। लेकिन इंडिया इंटरनेशनल साइंस फेस्टिवल में जो किट प्रयुक्त किया गया,  उसमें उक्त प्रयोग के नजरिये से विशेष परिवर्तन किये गए। 
डीएनए कोशिकाओं के अंदर होता है और इसे निकलने के लिए पहला काम कोशिकाओं के बाहरी आवरण को तोड़ना होता है। इसके लिए बनाये गए रासायनिक घोल (बफर) का विकास इसी संस्थान में किया गया।

(इस लेख का कुछ अंश 'आउटलुक' मैगज़ीन में प्रकाशित  हो चुका  है)


Saturday, July 1, 2017

India Launches ‘Ambitious’ Biopharma Mission



S&T minister Dr Harshvardhan (second from right), DBT 
secretary Prof K Vijaya Raghvan (right) and  Dr Renu 
Swarup (second from left), managing director, BIRAC in the 
press conference to announce the Pharma Mission 
By Vinod Varshney

New Delhi: India launched Friday an ‘ambitious’ Biopharma Mission to increase amidst highly competitive environment its share in the rapidly growing global market of biopharmaceuticals that stands today at US $ 156 billion. It shocks Indians who believe India to be a ‘science superpower’ to note that it has currently a meagre 2.8 percent share in the lucrative global pie. The plan is to increase it to 5 percent in next five years. 

Union minister of Science and Technology, Dr Harsh Vardhan terms the ‘Mission’ a ‘game changing initiative’. The strategy according to him is to develop a state of the art infrastructure which would be open to be used by start-ups and industrial set-ups. Theoretically it sounds promising, but the actual success will depend on its execution.  

Under the Mission there will be a Scientific Advisory Committee, which will also include global scientific representatives to steer it. The minister claimed that in the next five years, 6 to 10 new biopharma products would be launched in the market. If it really happens the people of India will adore the Mission, scientocrats of the ministry and upcoming start-up enthusiasts.

The Mission may be seen in the backdrop of current proclivity of the Modi government to focus on ‘impact’ of the scientfic research and development, an euphemism for how the public money is being used to develop products which are useful to Indians or the national economy. This ‘focus’ has resulted into sending government scientific departments into a tizzy that scurry for business models while formulating their overall research and development plan. The Biopharma Mission is the latest example of this.

Interestingly, India that commands an annual gross domestic product of around US $ 2 trillion is seeking the help of World Bank in this Biopharma Mission. The Word Bank would extend a loan of US $ 125 million and the government of India would be putting in similar amount to make it a US $ 250 million Mission.

The minister seems gung-ho at the arrangement. He claimed in the press conference called Friday to announce the mission, “The World Bank is helping first time in an R&D activity!” Would the presence of Word Bank not deflect focus of the Indian R&D as the world body is known for subtly influencing national policies? The minister responded with his characteristic smile, “So long as I am the minister and Modiji the prime minister, there is no question of any such influence.” “And so far as scientific field is concerned, there is no harm in seeking foreign collaboration,” he added thoughtfully.

Prof K Vijay Raghavan, the secretary Department of Biotechnology emphasises that the focus would be to create a robust Biotechnology ‘ecosystem’ which will not only help academia but also the industry, especially the startups. It would be a shared infrastructure.

Dr Renu Swarup, the managing director of BIRAC (Biotechnology Industry Research Assistance Council) in answer to a question said,” We don’t lack availability of intellect in the country but technology platform is required that we are now going to create.” “Even industry cannot affford to establish a platform technology,” she said.

She informs that the Mission would focus more on new vaccines, bio-therapeutics, diagnostics and medical devices to better address the rising burden of diseases in the country. It will strengthen the entire product development value chain and accelerate research leads to product development, but most important is the creation of an echo-system which will continue to support a continupus pipeline of new products.

Currently Indian biopharmaceutical industry is around 10-15 years behind developed countries and faces stiff competition from China and Korea. According to the Global Innovation Index, India ranks 81 among 140 countries, way below China (rank 29) and South Korea (rank 14). Success of the Mission, therefore, will depend on how much and how fast, it pushes Indian researchers and entrepreneurs into an innovation spree. 

Sunday, May 15, 2016

Why Block the Useful Science?

By Vinod Varshney
India’s policy-making is overwhelmed by those who have mastered the art of blocking benefits of science reaching to farmers. Sounds preposterous, but it is true, especially in the field of genetically modified crops, which hold the promise of revolutionising Indian agriculture. But these are not being allowed to move from lab to land on ideological grounds. The arguments in opposition are sometimes facetious, like these are meant to benefit only MNCs, who have monopoly over the technology and intend to bring vast Indian agriculture under their control for their own profit to the bewilderment of Indian farmers. Using scientific jargon, they also allege that it might lead to uncontrolled genetic pollution in other varieties and consumption of genetically modified foods might also be harmful to human health. They ignore that genetically modified crops are being grown in so many countries, developing and developed both, cutting down input cost, improving yield and quality of the food. While they raise spectre of damage to health, they pass over the fact that we import such foods and millions of Indians eat them in the country as well as abroad without any harm.  

Tuesday, January 5, 2016

John Gurdon Compensates Kalam’s Loss

By Vinod Varshney

APJ Abdul Kalam was nostalgically remembered in the Rashtriya Kishore Vaigyanik Sammelan, a 3-day apex national event of child scientists, which began Monday (04-01-2016) at Mysore University campus. Child scientists fondly remembered their Guru who used to seek a pledge from them to dream high and be creative. However, the loss was compensated by presence of British Nobel Laureate John B Gurdon who was as inspiring in his 82nd year as ever and resurrected the vision of Kalam.

Inaugurating the Rashtriya Kishore Vaigyanik Sammelan, the 82-year Gurdon presented a comparative view of how life has totally changed, thanks to scientific developments during last fifty years. ‘There was a time when we used to communicate through post, but today communication has become spontaneous and almost instantaneous. Right from television to genetically modified crops, one can see enormous developments have taken place in the field of science. Science and technology has completely changed the lives of people. On the basis of the achievements in science & technology during last 50 years, one can predict what may come through science in next 50 years’, he said.

Giving a historical perspective while speaking in the inaugural session, which saw an attendance of more than 5,000 delegates from all over the country and abroad, he told how during the first world war, people died even due to flu, but now antibodies have been discovered to fight this. Cars today can be driven without drivers, and small piece of skin can be cultured to become different parts of the body. Later in the evening in a plenary session of the Indian Science Congress, a five-day event started a day before, he gave a talk on his Nobel-winning research on this very issue, showing how by a few cells taken from the skin could be used to make cardiac cells, macular cells and even brain cells, which can be transplanted to cure related incurable diseases.

Odd 200 selected child scientists would be presenting their research in the ‘Rashtriya Kishore Vaigyanik Sammelan’ during the three days. They have been selected for that after a lengthy nation-wide exercise in which one million children of 10-17 year age group participated through their projects. They conceptualized, planned and executed projects with the help of their teacher guides to solve a select problem of their surrounding using scientific methods. Largely these projects relate to the focal theme. This spurs creative thinking and develops scientific temper in them. It has been found that they offer simple, innovative and cost-effective solutions to many unsolved problems. The focal theme this year was ‘Understanding Weather & Climate’.

Seeing the glowing faces of the child scientists, one can say, the 23rd Rashtriya Kishore Vaigyanik Sammelan turned out a rewarding experience for them as they were thrilled at getting opportunities to interact with Nobel Laureates and other top scientists and seeking autographs and selfies.


Most of the participants have been selected through the National Children Science Congress which took place at Mohali between 27 and 31 December. The event is organised every year by National Council of Science & Technology Communication, a department of the union government. 

Sunday, January 3, 2016

Indian Science To Get a Makeover



Prime minister Narendra Modi released the Vision 2035 for India's science & technology

By Vinod Varshney

Indian science may get a makeover in coming years if the announcements made by the prime minister Narendra Modi are sincerely implemented. More monetary allocations will be made for strategic projects. Not just more money, its efficacy would also be monitored by scientific audits to be undertaken in scientific departments and institutions. This apart a major focus of the government’s science and technology policy would be to encourage innovation and entrepreneurship.

The PM gave a sort of blue print of the challenges ahead and was lavishly cheered during his inspiring speech addressing around 15,000 scientist delegates including five Nobel Laureates, one Field Medal winner scientist among around hundred foreign participants and hundreds of top Indian scientists in the inaugural session of the 103rdIndian Science Congress at Mysore University.

He declared innovation as his government’s mantra for success. 'We have pledged to double national investments in innovation; and, build a global partnership that combines the responsibility of governments with the innovative capacity of the private sector. We need innovation to make renewable energy much cheaper; more reliable; and, easier to connect to transmission grids’, he said.

While he talked of making more funds available for science and technology, he also emphasized that funding of science should not just remain the duty of government, but should also be an obligation and responsibility of the private sector.

Not losing sight of the focal theme of the Indian Science Congress, ‘Science and Technology for Indigenous Development in India’ he narrated an array of issues where Indian scientists would be required to offer cost-efficient and environment-friendly solutions.

He talked of the challenge of rapidly increasing urban population,‘For the first time in human history, we are in an urban century. By the middle of this century, two-thirds of the world’s population will live in cities.'  

His speech had a flair of the recently concluded global agreement to cut carbon emissions for saving the planet. He set the agenda before the scientists, especially the younger lot, that they need to find the cost effective and efficient solutions which can also take care of the environment and the ecology. He urged to develop technologies which can provide prosperity with less reliance on energy.
‘I suggested an international network of 30-40 universities and labs focusing for next ten years on transforming the way we produce, distribute and consume energy. We will also pursue this in G-20. We will make it easier to do science and research in India, improve science administration, and expand the supply and improve the quality of science education and research in India.’

He spoke of an important new area, marine sciences, ‘Oceans occupy more than 70% of our planet; and, over 40% of humanity and 60% of the world’s largest cities are found within 100 kilometers of the coast. We are at the cusp of a new era, where oceans will become important drivers of our economies.We will set up an advanced centre of research in marine biology and biotechnology and establish a network of coastal and island research stations in India and abroad. We have entered into agreements on marine science and ocean economy with several countries. We will also hold an International Conference on ‘Ocean economy and Pacific Island Countries in New Delhi in 2016’ he declared.

He released the Vision 2035 also for the science and technology that India needs to focus on. 


Wednesday, December 30, 2015

India’s Ambitious Biotech Strategy




Senior adviser, DBT Dr Renu Sahay, secretary DBT Dr K Vijay Raghavan  & India's S&T minister Dr Harsh Vardhan at the launch ceremony of National Biotechnology Development Strategy 2015-20
  By Vinod Varshney

To keep pace with the revolutionary global advances in biotechnology, which has given novel agricultural, health, energy and environmental products, India has formulated its own ambitious strategy to emerge as a major player in this field. 

The National Biotechnology Development Strategy: 2015-20 has set a target of taking the current biotechnology industry size from $ 7 billion to $ 100 billion by 2025. The 36-page document prepared after discussing with various stakeholders over two years was formally released today by union minister of S&T and Earth Sciences, Dr Harsh Vardhan.  

The Strategy has for the first time opened the door for global public-private partnership which will usher global giants to establish their R&D Centres and manufacturing units in India with the help of government. Will this not hamper the growth of indigenous biotech companies? Dr Renu Sahay, the senior advisor in the Department of Biotechnology says, ‘No, it would, on the contrary, expose indigenous companies to global standards, practices and technologies. Ultimately they would benefit from all this.’ 

The general feeling among policy makers in India is that biotechnology holds similar promise of sparkling growth in India which information technology (IT) has been able to demonstrate in the past two decades. But India’s remarkable success in IT did not require any global public-private partnership, then why this is needed in the field of biotechnology? Dr K Vijay Raghavan, secretary Department of Biotechnology says, ‘India’s success in the IT sector is in services, which did not require this, but biotechnology is a much more complex thing which needs a lot of high tech research, therefore, partnering with global players would help India.’  

The Strategy cannot succeed without developing quality human resource in sufficient number that is not only highly skilled in bio-chemistry and bio-sciences but also innovative and possessing entrepreneurship. To take care of this issue, several initiatives have been formulated including launching of dual degree MSc-MBA programmes in agribusiness, pharma business and bio enterprise management. 

To spur research, several plans have been enumerated in the Strategy including giving due focus on translational research to convert basic research into technology to manufacture useful products. The plan is to establish Technology Development & Translational Cells in fifty research intensive universities of the country. This apart, 150 Technology Transfer Organisations would be set up across the country in research institutes and universities. All this will help in carrying forward four major biotechnology missions in healthcare, food and nutrition, clean energy and education.

The new Strategy has been formulated on the foundation laid down by an earlier strategy scripted for 2007-12 that was adopted by the UPA government in 2007 which helped the country establishing a robust infrastructure which led to numerous successes. Owing to this, two thirds of the world’s children today get at least one of the vaccines that is produced in India. It could evolve necessary guidelines for transgenic plants, recombinant vaccines & drugs, stem cell therapy etc. 

India could have done much better, but for the unpredictable changes in the way science and technology is done globally. Scientists in Indian labs have been working with the low-end equipments and most of the components had to be imported. It is being felt they can be easily produced in India at a fraction of the cost, says Dr K Vijay Raghavan. The new strategy has taken care of such issues perhaps because it has been formulated in consultation with the Niti Ayog which wants to promote innovation and entrepreneurship in all fields. 

There have been terrific developments in biotechnology in recent years with the revolutionary new ways of gene editing posing new legal, scientific and regulatory challenges. This aspect has been taken care of in the new strategy.